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Sunday, June 30, 2024

गोपथ -ब्राह्मण एक प्राचीन,वैदिक ग्रन्थ है।

 *गोपथ -ब्राह्मण एक प्राचीन,वैदिक ग्रन्थ है।*

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    *मंगलनाथ उज्जैन से-*

*गोपथ- ब्राह्मण में बताया गया है कि वास्तव में सूर्य न कभी उदित होता है ,ना हि कभी अस्त होता है।*


*स व एष आदित्य न कदचनास्तमेति नोदेति*

*यदस्तमेति इति मन्यन्ते अह्न एवतदन्तमित्वा ।*


*अथात्मानं विपर्यस्यते यदेनं प्रतरुदेतीति मन्यन्ते रात्रि रेवान्तमित्वाऽथ तमानं विपर्यस्यते न वा एष कदाचन निम्रोचति।।*

            *(गोपथ० 4/41)*


 *स वा एष आदित्य न कदाचनास्तमेती-यह सूर्य कभी भी अस्त नही होता, नोदेती - न ही कभी उदित होता है । तं यदस्तमेति इति मन्यते अन्ह एव , जो लोग सूर्य को अस्त मानते हैं वो ठीक नहि है ,क्यों कि अन्यत्र अह्न एव - कहीं पर दिन हो जाता है यदि सूर्य डूबता या अस्त होता तो वहाँ दिन नहीं रहना चाहिये ? इसलिये तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते सूर्य डूब जाता है ऐसा समझ ने वाले स्वयं को ही अज्ञान रूप अन्धकार मे डुबो लेते हैं ।*


*यदेनं प्रातरुदेतीतिमन्यते -*

*इसी प्रकार जो लोग डुबा हुआ सूर्य प्रात: काल में फिर से निकलता है ऐसा समझ ते हैं , रात्रिरेव -वो भी ठीक नही है क्यों कि इसी पृथ्वी में तो कहीं इस काल में भी रात्री ही तो है । अत: रात्रि का अन्त हुआ ऐसा समझने वाले लोग- तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते - रात्रि का अ न्त हुआ ऐसा समझकर स्वयं को ही मूर्ख बना लेते हैं ।*


*न वा एष कदाचन निम्रोचति -*

 *सूर्य न कभी पूर्व में,उदित होता है*

  *नाही कभी पश्चिम में अस्त होता है ।*


     *|| ॐ आदित्याय नमः  ||*




श्रीकृष्ण के अधीन नव ग्रह

 श्रीकृष्ण के अधीन नव ग्रह 

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जो जीव एक बार श्री कृष्ण के शरणागत हो जाता है, उसे फिर किसी ज्योतिषी को अपनी ग्रहदशा और जन्म कुंडली दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

इसके पीछे का विज्ञान तो यह है कि भगवान् के शरणागत जीव की रक्षा स्वयं भगवान् किया करते हैं।

और सब ग्रह, नक्षत्र, देवी देवता श्री कृष्ण की ही शक्तियाँ हैं, सब उनके ही दास हैं। इसलिए भक्त का अनिष्ट कोई कर नहीं सकता और प्रारब्ध जन्य अनिष्ट को कोई टाल नहीं सकता।

फिर भी कई बार हम अपने हाथों में में रंग-बिरंगी अंगूठियाँ पहनकर, जप, दान आदि करके हम अपने ग्रहों को तुष्ट करने में लगे रहते हैं।

श्रीकृष्ण हमारे सखा हैं।

आइये अब समझें कि किस ग्रह का हमारे सर्व समर्थ श्रीकृष्ण से कैसा संसारी नाता है।

जो मृत्यु के राजा हैं यम, वह यमुना जी के भाई हैं ,और यमुना जी हैं भगवान की पटरानी, तो यम हुए भगवान के साले, तो हमारे सखा के साले हमारा क्या बिगाड़ेंगे?

सूर्य हैं भगवान के ससुर (यमुना जी के पिता) तो हमारे मित्र के ससुर भला हमारा क्या अहित करेंगे?

सूर्य के पुत्र हैं शनि, तो वह भी भगवान के साले हुए, तो शनिदेव हमारा क्या बिगाड़ लेंगे?

चंद्रमा और लक्ष्मी जी समुद्र से प्रकट हुए थे। लक्ष्मी जी भगवान की पत्नी हैं, और लक्ष्मी जी के भाई हैं चंद्रमा, क्योंकि दोनों के पिता हैं समुद्र। 

तो चन्द्रमा भी भगवान के साले हुए, तो वे भी हमारा क्या बिगाड़ेंगे?

बुध चंद्रमा के पुत्र हैं, तो उनसे भी हमारे प्यारे का ससुराल का नाता है। हमारे सखा श्रीकृष्ण बुध के फूफाजी हुए, तो भला बुध हमारा क्या बिगाड़ेंगे?

बृहस्पति और शुक्र वैसे ही बड़े सौम्य ग्रह हैं, फिर, ये दोनों ही परम विद्वान् हैं, इसलिए श्रीकृष्ण के भक्तों की तरफ इनकी कुदृष्टि कभी हो ही नहीं सकती।

राहु केतु तो बेचारे जिस दिन एक से दो हुए, उस दिन से आज तक भगवान के चक्र के पराक्रम को कभी नही भूले भला वे कृष्ण के सखाओं की और टेढ़ी नजर से देखने की हिम्मत जुटा पाएँगे?

तो अब बचे मंगल ग्रह। 

ये हैं तो क्रूर गृह, लेकिन ये तो अपनी सत्यभामा जी के भाई हैं। चलो, ये भी निकले हमारे प्यारे के ससुराल वाले।  अतः श्रीकृष्ण के साले होकर मंगल हमारा अनिष्ट कैसे करेंगे? इसलिए श्री कृष्ण के शरणागत को किसी भी ग्रह से कभी भी डरने की जरूरत नहीं!

संसार में कोई चाहकर भी अब हमारा अनिष्ट नहीं कर सकता। इसलिए निर्भय होकर, डंके की चोट पर श्रीकृष्ण से अपना नाता जोड़े रखिए।

हाँ, जिसने श्रीकृष्ण से अभी तक कोई भी रिश्ता पक्का नहीं किया है, उसे संसार में पग-पग पर ख़तरा है।

उसे तो सब ग्रहों को अलग-अलग मनाना पडेगा। इसलिए ठाकुरजी की शरण रहे और उनकी कृपा से ही संभव होगा के अपने प्रभु पे आसक्ति रहे और अन्य जगह नहीं भटके तो वल्लभ के शरण रहिये तो सब उन सब की कृपा से अनुकूल रहेगे सब ग्रह ll

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हर हर महादेव

 !!  हर हर महादेव  !!


फिर एक दिन हम सब हार जाएंगे अपने आपसे, अपने जीवन से और अपनी यात्राओं से, वो भी हारेंगे जो हार नहीं मानते और वो भी हारेंगे जो कभी हारे नहीं। जिंदगी को ज़ब जो करना है वो तो करेगी लेकिन पहले जिंदगी को बेशुमार तरीके से जी तो लो।


हर दिन, हर पल को विशेष सूखदायी और मनोरंजक बनाओ। औरों की ज़िन्दगीयों को भी रंगारंग कर दो। आजकल जिसका चेहरा देखो तनाव और नेगेटिविटी से भरा होता है, मुस्कराहट का नामो निशान नहीं। जैसे पैसा पैसे को खिंचता है वैसे मुरझाया हुवा चेहरा और तनाव लायेगा।


🙏🙏





एक बेटे के अनेक मित्र थे जिसका उसे बहुत घमंड था।

 एक बेटे के अनेक मित्र थे जिसका उसे बहुत घमंड था। पिता का एक ही मित्र था लेकिन था सच्चा ।एक दिन पिता ने बेटे को बोला कि तेरे बहुत सारे दोस्त है उनमें से आज रात तेरे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते है। बेटा सहर्ष तैयार हो गया। रात को 2 बजे दोनों बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे, बेटे ने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा नहीं खुला,बार-बार दरवाजा ठोकने के बाद अंदर से बेटे का दोस्त उसकी माताजी को कह रहा था माँ कह दे मैं घर पर नहीं हूँ।यह सुनकर बेटा उदास हो गया, अतः निराश होकर दोनों लौट आए।*


फिर पिता ने कहा कि बेटे आज तुझे मेरे दोस्त से मिलवाता हूँ। दोनों पिता के दोस्त के घर पहुंचे। पिता ने अपने मित्र को आवाज लगाई। उधर से जवाब आया कि ठहरना मित्र, दो मिनट में दरवाजा खोलता हूँ। जब दरवाजा खुला तो पिता के दोस्त के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी। पिता ने पूछा, यह क्या है मित्र। तब मित्र बोला....अगर मेरे मित्र ने दो बजे रात्रि को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर वह मुसीबत में होगा और अक्सर मुसीबत दो प्रकार की होती है,या तो रुपये पैसे की या किसी से विवाद हो गया हो। अगर तुम्हें रुपये की आवश्यकता हो तो ये रुपये की थैली ले जाओ और किसी से झगड़ा हो गया हो तो ये तलवार लेकर मैं तुम्हारें साथ चलता हूँ। तब पिता की आँखे भर आई और उन्होंने अपने मित्र से कहा कि, मित्र मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं, मैं तो बस मेरे बेटे को मित्रता की परिभाषा समझ रहा था।


अतः बेशक मित्र, एक चुनें, लेकिन नेक चुनें।




Saturday, June 29, 2024

आज का संदेश

 आज का संदेश 


         यदि प्रेम के बदले प्रेम का प्रत्युत्तर न भी मिले, अपने को ठगे जाने और घाटे में रहने का अवसर आवे तो भी उसकी हानि केवल भौतिक हानि ही रहेगी। प्रेम की दिव्य अनुभूतियाँ अपने अन्तःकरण में जब उठती रहती है तो वहाँ पुष्प-वाटिका की तरह सौंदर्य और सुगन्ध का साम्राज्य छाया रहता है। उसका आनन्द तो अपने को मिलता ही है। आत्मा की सबसे प्रिय अनुभूति प्रेम है। उसका रसास्वादन होते रहने से आत्म तृप्ति, आत्म सन्तोष और आत्मोल्लास का जो हर घड़ी लाभ होता रहता है उसकी तुलना में यदि कुछ भौतिक हानि उठानी पड़े तो वह तुच्छ एवं नगण्य ही मानी जायगी।


         प्रेम की एक-एक बूँद के लिए यह दुनिया तरस रही है। अनावृष्टि काल में पानी का जैसा अकाल रेगिस्तानों में पड़ता है वैसा ही प्रेम दुर्भिक्ष आज सर्वत्र छाया हुआ है। प्रेम के नाम पर ठगी, चापलूसी, वासना और शोषण की प्रवंचना तो खूब बढ़ी है पर सच्चा प्रेम-जिसमें आत्म-दान और निःस्वार्थ सेवा का ही समावेश होता है अब देखने को नहीं मिलता इस आध्यात्मिक विभूति के अभाव में जीवन नीरस ही बने रहते हैं। सब ओर कुछ खोया-खोया सा, सब ओर अभाव-अभाव सा ही दिखाई पड़ता है। यदि सच्चे प्रेम के कुछ कण भी किसी को प्राप्त हो जाते हैं तो सचमुच ही उसके सब अभाव पूर्ण हो जाते हैं।


           अपने भीतर सच्चे प्रेम की भावनाएँ जागृत करनी चाहिए, दूसरों को अपना मानना चाहिए, उन्हें आत्मीयता की दृष्टि से देखना चाहिए, फलस्वरूप हम भी सच्चे प्रेम के रसास्वादन से वंचित न रहेंगे। संसार के खेत में अपना प्रेम बीज बखेरते फिरें तो कोई-कोई पौधा उसका जरूर उगेगा और उसकी सुगंध से भी हमें आनंद और तृप्ति देने लायक बहुत कुछ मिल जायगा।



आज का संदेश

आज का संदेश 


         कई लोग संतोष की आड़ में अपनी अकर्मण्यता को छिपा लेते हैं तो कई लोगों द्वारा प्रयत्न ना करना ही संतोष समझ लिया जाता है। संतोष का अर्थ ये नहीं है कि प्रयत्न ही ना किया जाए अपितु प्रयत्न करने के बाद जो भी मिल जाए उसमें प्रसन्न रहना ही संतोष है। 


         प्रयत्न करने अथवा पुरुषार्थ करने में असंतोषी रहो, प्रयास की अंतिम सीमाओं तक जाओ। एक क्षण के लिए भी अपने लक्ष्य को मत भूलो। तुम क्या हो, यह मुख से मत बोलो क्योंकि लोगों तक तुम्हारी सफलता बोलनी चाहिए। 


        किसी कार्य को करते समय सब कुछ मुझ पर ही निर्भर है, इस भाव से कर्म करो एवं कर्म करने के बाद सब कुछ प्रभु पर ही निर्भर है, इस भाव से शरणागत हो जाओ। परिणाम में जो प्राप्त हो उसे प्रेम से स्वीकार कर लो। करने में सावधान और होने में प्रसन्न, यही आनंदमय जीवन का रहस्य है।


पौराणिक रहस्य कथा जिसे कम ही लोग जानते हैं.....

 पौराणिक रहस्य कथा जिसे कम ही लोग जानते हैं........


 हमारे पौराणिक ग्रंथों को रचते समय विद्वान लेखकों ने ऐसे-ऐसे हैरतअंगेज रहस्यों का उल्लेख किया है़ कि जिसको जानने के बाद हर कोई आश्चर्य में पड़ जाता है़। 


तब सभी के मन में कौतूहल जन्म ले लेता है़ और हृदय में यही सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या ऐसा भी हो सकता है ?


कहते हैं कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी अपना ‘राम चरित  मानस’ ग्रंथ लिखते- लिखते अरण्य कांड पर पहुँच गए थे। तब वह अरण्य कांड में सीता हरण वाले प्रसंग में पहुंचकर बड़े गंभीर सोच में पड़ गए। क्योंकि एक तरफ तो उन्हें अपना ग्रंथ पूरा करना था और दूसरी तरफ माता सीता की पवित्रता को गंगा की तरह निर्मल बनाये रखना था।


          अब वे अजीबोगरीब अनेक प्रकार के विचारों के जाल में उलझ गये। तब आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उस समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने विज्ञान का सहारा लिया। कहते हैं कि उन्होंने विज्ञान से जुड़ी हुईं तमाम पुस्तकों के पन्नों को पलट डाला। कुछ मानस मर्मज्ञ कहटे हैं कि उन्होंने विज्ञान का विस्तार से अध्ययन ही नहीं किया बल्कि एक अनोखा शोध कार्य भी कर डाला।


         कहते हैं कि जिस रहस्य के बारे में लक्ष्मण जी को भी पता नहीं था,   गोस्वामी तुलसी दास जी ने अपने ‘राम चरित मानस’ में विज्ञान के उस अनूठे रहस्य का सहारा लिया। निश्चय रूप से अरण्य कांड पढ़ते समय आपने यह दोहा अवश्य पढ़ा होगा कि..


लक्ष्मणहुँ यह मरम ना जाना।

जा कुछ चरित रचा भगवाना।।


      दरअसल गोस्वामी तुलसीदास जी इन दोनों पंक्तियों में रामचरितमानस के गूढ़ रहस्य को उजागर करना चाहते हैं। कहते हैं कि लक्ष्मण जी को भी उस रहस्य के बारे में जानकारी नहीं थी, जिस रहस्य की गाथा पहले ही विधाता लिख चुके थे। पुराणों में वर्णित है़ कि रामचरित मानस के अरण्य कांड में लंका पति रावण जब सीता जी का हरण करने आया तो उसकी यह पहली गलती नहीं थी बल्कि गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार यह उसका दूसरा दुस्साहस था।


       उसकी इस दूसरी गलती के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी लंकापति रावण की इस दुष्ट सोंच से छल पूर्वक निपटना चाहते थे, क्योंकि कहा जाता है़ कि इसी रावण ने एक बार ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की विद्वान पुत्री देवी वेदवती का भी शील भंग करने का प्रयास किया था, एवं उनके केशों को पकड़ कर घसीटा था। तब अपने अपमान से क्रोधित एवं दुखी होकर देवी वेदवती ने योगविद्या द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया था।


          कहते हैं कि स्वयं को अग्नि में समर्पित करते-करते वेदवती ने संकल्प ले लिया था कि वह एक न एक दिन इस दुष्ट रावण से उसके इस दुस्साहस का प्रतिशोध अवश्य लेगी। कहते हैं कि अपना मानव जीवन त्याग देने के पश्चात भी वेदवती जीवात्मा के रूप में अग्निदेव की शरण में रही, और लंकापति रावण से प्रतिशोध लेने के बाद ही मुक्ति प्राप्त की ।


लंकापति रावण जिस सीता जी को हरण करके ले गया वे सीता न होकर उनका क्लोन था।


गोस्वामी तुलसी दास जी के अनुसार अब वह समय आ चुका था जब रावण के बल को छल पूर्वक निपटा जाये। तब 14 वर्ष के वनवास के दौरान पंचवटी में सीताहरण के पूर्व अग्नि देव से प्रार्थना की गई वह लंकापति रावण को दण्ड देने के लिए सहायता करें। दरअसल अग्नि देव के पास अभी तक ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की पुत्री वेदवती की जीवात्मा समाहित थी।


        उस समय यह योजना बनायी गयी कि ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की पुत्री वेदवती की जीवात्मा को किसी तरह सीता जी के क्लोन में प्रविष्ट करा दिया   जाये और असली सीता जी को कहीं छिपा दिया जाये। ताकि सीता जी 14 वर्ष के वनवास में सुरक्षित रह सकें और वनवास के पश्चात श्री राम के पास सकुशल पहुंचाया जा सके।


कहते हैं कि तब ब्रह्मा जी ने सीता जी की उंगली से कोशिका लेकर सीता जी के सदृश्य ही एक पुतला तैयार कर दिया और योजना के अनुसार वेदवती की जीवात्मा को सीता जी के पुतले में प्रविष्ट करा दिया गया। इस प्रकार जब वन में पंचवटी कुटिया में श्री राम और श्री लक्ष्मण जी के जाने के बाद जो नारी अकेली आश्रम में रह गईं वह सीता जी न होकर उनकी क्लोन थी।

क्योंकि असली सीता जी तो अग्नि देव के शरण में पहुंच गई थी। फिर विधाता को वेदवती द्वारा रावण से प्रतिशोध लेने के प्रण को पूरा जो कराना था। इसलिए उन्होंने रावण द्वारा सीता जी नहीं बल्कि उनके पुतले में स्थापित वेदवती की जीवात्मा का हरण करा दिया। उन वेदवती नामक देवी (जो स्वयं महामाया का ही अंश थीं) ने लंका पहुंचकर रावण के नाकों चने चबवा दिये।


रावण क्यों भय खाता था सीता जी के पास जाने से 


रामचरितमानस के कई प्रसंगों में सीता जी के क्लोन का रहस्य उजागर होता है। इस बात का तो पुराणों में स्पष्ट वर्णन भी किया गया है कि लंका पति रावण ने सीता जी को अपने महाद्वीप लंका में अशोक वाटिका में कैद करके रखा था । कहते हैं कि रावण जब भी सीता जी पर अत्याचार करने के लिए आगे कदम बढ़ाता था तो धरती में से एक अग्नि-ज्वार फूट पड़ता था, जिसमें भस्म हो जाने के भय से रावण वापस भाग जाता था ।


सीता जी के आस -पास अग्नि का पहरा होने का एक कारण यह भी बताया जाता है कि सीता जी के क्लोन मे रहने वाली देवी वेदवती की जीवात्मा के साथ सदैव अग्नि देव रहते थे। क्योंकि ब्रह्म ऋषि की पुत्री वेदवती, मृत्यु के पश्चात (जीवात्मा रूप में) उन्हीं अग्नि देव में समाहित थीं।

कहते हैं कि एक बार दुष्ट रावण ने सीता जी को मार डालने का प्रयास किया । लेकिन उसी समय सीता जी के काया के अंदर उपस्थित विद्वान देवी वेदवती ने एक अमोघ महा मंत्र पढ़कर दुष्ट रावण की तरफ फेंका। जिसके कारण वह घास के तिनके के समान छिटक कर दूर जा गिरा।


इसीलिए सीता जी लक्ष्मण जी या हनुमान जी के साथ नहीं आयीं

राम चरित मानस में कई बार ऐसा प्रसंग आया कि जब सीता जी पवन सुत हनुमान जी अथवा लक्ष्मण जी के साथ लंका से वापस श्री राम जी के पास वापस आ सकती थीं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। क्योंकि उस समय वेदवती की जीवात्मा एक निश्चित समय के लिए सीता जी की परछाई में विलीन थी। यदि वह उस समय के पूर्व वापस श्री राम जी के पास आ भी जाती तो भी देवी वेदवती सीता जी के शरीर से न निकल पाती।

फिर देवी वेदवती को अपने प्रतिशोध स्वरुप रावण का वध जो करवाना था। रावण का समूल नाश ही उनके प्रतिशोध का मुख्य उद्देश्य था। इसलिए जब तक लंका का सर्वनाश न हो जाये तब तक वह वापस श्री राम के पास कैसे जा सकती थी। देवी वेदवती में तमाम वेदों का ज्ञान व शक्ति थी। वह चाहती तो स्वयं भी रावण का संहार कर सकती थी।


क्योंकि लंकापति रावण द्वारा वेदवती को अपमानित किए जाने के बाद से ही वह प्रतिशोध की अग्नि में तप रही थी। लेकिन इस बारे में अग्नि देव जी ने देवी वेदवती से प्रार्थना की थी कि लंका पहुंचकर वह ऐसा कोई कार्य न करें कि जिससे सीता जी की परछाई का भेद खुल जाये।


फिर देवी वेदवती भी भगवान श्री राम के कर-कमलों के द्वारा ही रावण को उसके कुकर्मों का प्रतिफल दिलाना चाहती थी। कदाचित विधाता ने ऐसा ही रच रखा था और देवी वेदवती यह बात जानती थी। इसीलिए तमाम शक्तियों से परिपूर्ण होने के बावजूद देवी वेदवती ने लंका में अपनी सीमितता बनाये रखी और रावण को मारे जाने तक मूकदर्शक बनी रही।


*और अंत में श्रीराम द्वारा सीताजी की अग्निपरीक्षा की लीला रची गयी जिसमे वेदवती सीता जी की छाया प्रवेश कर गयी और असली सीता बाहर आगयी..*


 *क्या होता है यह क्लोन*


विज्ञान की भाषा में कहें तो क्लोन वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किसी जीवित कोशिका से तैयार की गई उसके जैसी ही प्रतिच्छाया है़। जिसका रंग, रूप, बनावट असली यानी वास्तविक होने का आभास कराता है़। यह क्लोन पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, मनुष्य आदि किसी का भी हो सकता है। क्लोन वह प्रतिबिंब है़ जिसका चेहरा- बनावट आदि वास्तविकता का आभास कराती है।

कहते हैं कि देश-विदेश के कुछ-एक प्राचीन, रहस्यमय युद्ध में क्लोन का उपयोग किया गया। दुश्मनों झांसा देने के लिए युद्ध भूमि में राजा का क्लोन खड़ा कर दिया जाता था। दुश्मन की सेना उस क्लोन को असली राजा समझ कर उलझी रहती थी। तब तक राजा को अपनी की सेना को सुदृढ़ करने का समय मिल जाता था और वह पुनः संगठित होकर दुश्मन पर पूरी ताकत के साथ हमला बोल देता था और विजय हासिल कर लेता था।।


जय जय श्री राधे!!



मन चंगा तो कठौती में गंगा..

 मन चंगा तो कठौती में गंगा................


एक बार की बात है, एक परिवार में पति पत्नी एवं बहू बेटा याने चार प्राणी रहते थे। समय आराम से बीत रहा था। 

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चंद वर्षो बाद सास ने गंगा स्नान करने का मन बनाया। वो भी अकेले पति पत्नी। बहू बेटा को भी साथ ले जाने का मन नहीं बनाया। 

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उधर बहू मन में सोच विचार करती है कि भगवान मेंने ऐसा कौन सा पाप किया है जो में गंगा स्नान करने से वंचित रह रही हूँ। 

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सास ससुर गंगा स्नान हेतु काशी के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगे तो बहू ने सास से कहा कि माँसा आप अच्छी तरह गंगा स्नान एवं यात्रा करिएगा। 

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इधर घर की चिंता मत करिएगा। मेरा तो अभी अशुभ कर्म का उदय है वरना में भी आपके साथ चलती। 

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सारी तैयारी करके दोनों काशी के लिए रवाना हुए। मन ही मन बहू अपने कर्मों को कोस रही थी, कि आज मेरा भी पुण्य कर्म होता तो में भी गंगा स्नान को जाती। खेर मन को ढाढस बंधाकर घर में रही। 

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उधर सास जब गंगाजी में स्नान कर रही थी। स्नान करते करते घर में रखी अलमारी की तरफ ध्यान गया और मन ही मन सोचने लगी कि अरे अलमारी खुली छोडकर आ गई, कैसी बेवकूफ औरत हूँ बंद करके नहीं आई। 

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पीछे से बहू सारा गहना निकाल लेगी। यही विचार करते करते स्नान कर रही थी कि अचानक हाथ में पहनी हुई अँगूठी हाथ से निकल कर गंगा में गिर गई। 

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अब और चिंता बढ़ गई की मेरी अँगूठी गिर गई। उसका ध्यान गंगा स्नान में न होकर सिर्फ घर की अलमारी में था। 

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उधर बहू ने विचार किया कि देखो मेरा शुभ कर्म होता तो में भी गंगा जी जाती। सासु माँ कितनी पुण्यवान है जो आज गंगा स्नान कर रही है। 

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ये विचार करते करते एक कठौती लेकर आई और उसको पानी से भर दिया, और सोचने लगी सासु माँ वहाँ गंगा स्नान कर रही है और में यहाँ कठौती में ही गंगा स्नान कर लूँ। 

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यह विचार करके ज्योंही कठौती में बैठी तो उसके हाथ में सासु माँ के हाथ की अँगूठी आ गई और विचार करने लगी ये अँगूठी यहाँ कैसे आई ये तो सासु माँ पहन कर गई थी। 

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इतना सब करने के बाद उसने उस अँगूठी को अपनी अलमारी में सुरक्षित रख दी और कहा कि सासु माँ आने पर उनको दे दूँगी। 

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उधर सारी यात्रा एवं गंगा स्नान करके सास लौटी तब बहू ने उनकी कुशल यात्रा एवं गंगा स्नान के बारे में पूछा.. 

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तो सास ने कहा कि बहू सारी यात्रा एवं गंगा स्नान तो की पर मन नहीं लगा। 

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बहू ने कहा कि क्यों माँ ? मेंने तो आपको यह कह कर भेजा था कि आप इधर की चिंता मत करना में अपने आप संभाल लूँगी। 

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सास ने कहा कि बहू गंगा स्नान करते करते पहले तो मेरा ध्यान घर में रखी अलमारी की तरफ गया और ज्योंही स्नान कर रही थी कि मेरे हाथ से अँगूठी निकल कर गंगाजी में गिर गई। अब तूँ ही बता बाकी यात्रा में मन कैसे लगता। 

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इतनी बात बता ही रही थी कि बहू उठकर अपनी अलमारी में से वह अँगूठी निकाल सास के हाथ में रख कर कहा की माँ इस अँगूठी की बात कर रही है क्या ? 

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सास ने कहा, हाँ ! यह तेरे पास कहाँ से आई इसको तो में पहन कर गई थी। और मेरी अंगुली से निकल कर गंगाजी मे गिरी थी। 

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बहू ने जबाब देते हुई कहा कि, माँ जब गंगा स्नान कर रही थी तो मेरे मन में आया कि देखो माँ कितनी पुण्यवान है जो आज गंगा स्नान हेतु गई। 

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मेरा कैसा अशुभ कर्म आड़े आ रहा था जो में नहीं जा सकी। इतना सब सोचने के बाद मेंने विचार किया कि क्यों में यही पर कठौती में पानी डाल कर उसको ही गंगा समझकर गंगा स्नान कर लूँ। 

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जैसे मेंने ऐसा किया और कठौती में स्नान करने लगी कि मेरे हाथ में यह अँगूठी आई। में देखा यह तो आपकी है और यह यहाँ कैसे आई। 

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इसको तो आप पहन कर गई थी। फिर भी में आगे ज्यादा न सोचते हुई इसे सुरक्षित मेरी अलमारी में रख दी। 

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सास ने बहू से कहा, बहू में बताती हूँ कि यह तुम्हारी कठौती में कैसे आई। 

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बहू ने कहा, माँ कैसे ? 

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सास ने बताया, बहू देखो "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। मेरा मन वहाँ पर चंगा नहीं था। में वहाँ गई जरूर थी परंतु मेरा ध्यान घर की आलमारी में अटका हुआ था.. 

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और मन ही मन विचार कर रही थी की अलमारी खुली छोडकर आई हूँ कहीं बहू ने आलमारी से मेरे सारे गहने निकाल लिए तो। 

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तो बता ऐसे बुरे विचार मन में आए तो मन कहाँ से लगनेवाला और अँगूठी जो मेरे हाथ से निकल कर गिरी वह तेरे शुद्ध भाव होने के कारण तेरी कठौती में निकली। 

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इस कथा का सार यह ही है कि जीवन में पवित्रता निहायत जरूरी है। वर्तमान में हर प्राणी का मन अपवित्र है, हर व्यक्ति का चित्त अपवित्र है। 

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चित्त और चेतन में काम, क्रोध, मोह, लोभ जैसे विकार इस तरह हावी है कि हम उन्हें समझ नहीं पा रहे हैं। उस विकृति के कारण हमारा जीना बहुत दुर्भर हो रहा है। 

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बाहर की गंदगी को हम पसंद नहीं करते, वह दिखती है, तत्क्षण हम उसे दूर करने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारे भीतर में जो गंदगी भरी पड़ी है उस और हमारा ध्यान नहीं जाता है।  

आज जिस पवित्रता की बात की जानी है, उस पवित्रता का सम्बद्ध बाहर से नहीं है, भीतर की पवित्रता से है।।


जय जय श्री राधे!!



त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये*

 *त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये*

  *प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूँ हूँ त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा*


*कामाख्ये काम-सम्पन्ने कामेश्वरि ! हर- प्रिये !*

*कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि ! नमोऽस्तु ते ॥*


*कामदे काम-रूपस्थे सुभगे सुर-सेविते !*

*करोमि दर्शनं देव्याः* *सर्व-कामार्थ-सिद्धये ॥*


*योगेश्वरी-निकेतनम्*


*हे कामाख्ये देवि ! कामना पूर्ण करने वाली, कामना की अधिष्ठात्री,शिवप्रिये ! मुझे सदा शुभकामनाएँ दो और मेरी कामनाओं को सिद्ध करो। हे कामना देनेवाली, कामना के रूप में ही स्थित रहनेवाली, सुन्दरी और देव-गणों से सेविता देवि! सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए मैं आपके दर्शन करता हूँ।*


*बताया जाता है कि कामाख्‍या देवी का मंदिर 22 जून से 25 जून तक बंद रहता है। माना जाता है कि इन दिनों में माता सती रजस्‍वला रहती हैं। इन 3 दिनों में पुरुष भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते। कहते हैं कि इन 3 दिनों में माता के दरबार में सफेद कपड़ा रखा जाता है, जो 3 दिनों में लाल रंग का हो जाता है। इस कपड़े को अम्बुवाची वस्‍त्र कहते हैं। इसे ही प्रसाद के रूप में भक्‍तों को दिया जाता है।*


*तीन बार दर्शन करना जरूरी*

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*मान्‍यता है कि जो लोग इस मंदिर के दर्शन तीन बार कर लेते हैं, तो उन्‍हें सांसारिक भवबंधन से मुक्ति मिल जाती है। यह मंदिर तंत्र विद्या के लिए मशहूर है। इसलिए दूर दूर से साधु संत भी यहां दर्शन के लिए आते हैं।*


*हर साल यहां विशाल मेला लगता है। जिसे अंबुवाची मेला कहते हैं। यह मेला जून में लगता है। यह मेला उसी दौरान लगता है, जब माता मासिक धर्म से होती हैं। इस दौरान मंदिर में जाने की अनुमति किसी को नहीं होती।*


     *||कामाख्या देवी की जय हो ||*




भगवान विष्णु को सुक्राचार्य का श्राप

 || भगवान विष्णु को सुक्राचार्य का श्राप-||

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  जाने उज्जैन से-

शुक्राचार्य जी ने भगवान शंकर से प्राप्त की थी

             मृतसंजीवनी विद्या 

भगवान शिवजी की स्तुति कर भृगुनन्दन कवि ने कहा- ब्रह्मादिक ऋषियों को भी जो विद्या प्राप्त नहीं है,ऐसी विद्या मैं आपसे प्राप्त करना चाहता हूं। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे मृत प्राणियों को संजीवित कर देने वाली विद्या प्रदान करें।'


यदि तुष्टो महादेव विद्यां देहि महेश्वर। 

  यया जीवन्ति संप्राप्ता मृत्युं संख्येऽपि जन्तव:।। 

               (स्कन्दपुराण)


काशी जैसे अविमुक्त क्षेत्र में किए गए पुण्यों के फल स्वरूप मैं तुम्हें पुत्र रूप में देखता हूँ। जो मेरे तपोबल से निर्मित मृतसंजीवनी विद्या है, उसे मैं तुमको प्रदान करता हूँ।भगवान शिव द्वारा कवि (शुक्राचार्य) को मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाली मृतसंजीवनी विद्या प्रदान की।साथ ही यह वर दिया कि 'तुम आकाश में अत्यन्त दीप्ति मान् तारारूप से स्थित होओगे। आकाश में तुमारा तेज सब नक्षत्रों में सबसे उज्जवल होगा। जो स्त्री और पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहने पर यात्रा करेंगे,उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि पड़ने से नष्ट हो जाएगा। तुम्हारे उदयकाल में ही मनुष्यों के विवाह आदि शुभ कार्य फलप्रद होंगे।


दानी कहुँ संकर-सम नाहीं। दीन-दयालु दिबोई भावै,

                 (विनयपत्रिका)


अब आगे पढ़े कथा-

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भगवान विष्णु को सात बार अवतार लेना पड़ा, इसका एक कारण मानव जाति का कल्याण करना तो था ही इसके साथ ही इन अवतारों के पीछे भगवान विष्णु को दिए गए श्राप भी हैं, इस श्राप के कारण भगवान को सात बार अवतार लेना पड़ा।


आखिर भगवान विष्णु को श्राप किसने 

    दिया तो आइए जानते है इसके बारे में....


हरवंश पुराण में उल्लेखित एक कथा के अनुसार एक बार दानव गुरु शुक्र भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पर गए तथा उनसे दानवों को देवताओं से सुरक्षित रखने का उपाय पूछा, शिव शुक्र से बोले की तप ही एक मात्र ऐसा साधन है जिसके प्रभाव से तुम दानवां को देवताओ से सुरक्षित रख सकते हो। भगवान शिव के आज्ञा से शुक्र तप करने चले गए तथा कई वर्षां तक उन्होंने घोर तप किया।


जब शुक्र तप में लीन थे उस समय देवताओं और असुरों के मध्य बहुत भयंकर युद्ध हुआ व इस युद्ध में भगवान विष्णु ने शुक्र की माता का वध कर दिया। जब शुक्र का तप पूरा हुआ तो उन्हें वरदान स्वरूप मृत संजीवनी की दीक्षा प्राप्त हुई, इस शक्ति के प्रभाव से वे मृत व्यक्ति को पुनः जीवित कर सकते थे।तपस्या के बाद वापस अपने आश्रम में लौटने पर जब उन्होंने देखा की उनकी माता मृत पड़ी है तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने तपो बल के प्रभाव से यह जान लिया की उनकी माता की मृत्यु का कारण भगवान विष्णु हैं। उन्होंने क्रोध में आकर भगवान विष्णु को श्राप देते हुए कहा की विष्णु तुम्हें सात बार पृथ्वी में जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त होना पड़ेगा।


इसके बाद उन्होंने मृत संजीवनी मंत्र से अपनी माता सहित सभी देत्यों को पुनः जीवित कर दिया और स्वर्ग 

में आक्रमण की तैयारी करने लगे। शुक्र द्वारा दिया गया श्राप भगवान विष्णु के लिए वरदान सिद्ध हुआ और दानवों के लिए श्राप, क्योंकि भगवान विष्णु ने सात 

बार पृथ्वी में मानव रूप में जन्म लेकर दानवों का संहार किया।


         ||  विष्णु भगवान की जय हो ||




वैदिक वर्ण व्यवस्था में शूद्र किसे माना गया है

 वैदिक वर्ण व्यवस्था में शूद्र किसे माना गया है

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शोचनीयः शोच्यां स्थितिमापन्नो वा सेवायां साधुर अविध्द्यादिगुणसहितो मनुष्यो वा


अर्थात शूद्र वह व्यक्ति होता है जो अपने अज्ञान के कारण किसी प्रकार की उन्नत स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाया और जिसे अपनी निम्न स्थिति होने की तथा उसे उन्नत करने की सदैव चिंता बनी रहती है अथवा स्वामी के द्वारा जिसके भरण पोषण की चिंता की जाती है | 


शूद्रेण हि समस्तावद यावत् वेदे न जायते


अर्थात जब तक कोई वेदाध्ययन नहीं करता तब तक वह शूद्र के सामान है वह चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो 


जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्यते


 अर्थात प्रत्येक मनुष्य चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो वह जन्म से शूद्र ही होता है | उपनयन संस्कार में दीक्षित होकर विद्याध्ययन करने के बाद ही द्विज बनता है | 

जो मनुष्य अपने अज्ञान तथा अविद्ध्या के कारण किसी प्रकार की उन्नत स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता वह शूद्र रह जाता है।


 महर्षि मनु ने शूद्र के कर्म इस प्रकार बताये हैं

एकमेव तु शूद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत।

एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।।


अर्थात परमात्मा ने शूद्र वर्ण ग्रहण करने वाले व्यक्तियों के लिए एक ही कर्म निर्धारित किया है वो यह है कि अन्य तीनों वर्णों के व्यक्तियों के यहाँ सेवा या श्रम का कार्य करके जीविका करना | क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति शूद्र होता है अतः वह सेवा या श्रम का कार्य ही कर सकता है इसलिए उसके लिए यही एक निर्धारित कर्म है | 

अब यदि कोई यह कुतर्क दे कि शूद्र को सेवा कार्य क्यों दिया उसे अन्य कार्य क्यों नहीं दिया, यह तो शूद्र के साथ पक्षपात है; तो विचार कीजिये कि शूद्र कहा किसे है ? उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि शूद्र वह व्यक्ति होता है जो अशिक्षित एवं अयोग्य होता है| जो अशिक्षित व अयोग्य है क्या उसे सेवा के अलावा अन्य कोई जिम्मेदारी दी जा सकती है ? आधुनिक प्रशासन व्यवस्था में भी चार वर्ग निश्चित किये गए हैं – प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तृतीय श्रेणी और चतुर्थ श्रेणी | यदि कुतर्क की दृष्टि से सोचा जाये तो यह भारत सरकार का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के साथ पक्षपात है; सरकार को हर अशिक्षित व्यक्ति को डॉक्टर, इंजीनियर और जज बना देना चाहिए | अब जरा विचार कीजिये कि यदि अशिक्षित व्यक्ति डॉक्टर बना दिया जाए तो वह कैसा इलाज करेगा ? अशिक्षित व्यक्ति को जज बना दिया जाए तो वह कैसा फैसला सुनाएगा ? इसलिए वैदिक वर्ण व्यवस्था में कर्म एवं योग्यतानुसार ही वर्ण निर्धारण किया गया है क्योंकि व्यक्ति योग्यतानुसार ही अपना अपना कार्य ठीक से कर सकता है


*इसीलिए यह कहावत है कि जिसका काम उसी को साजे, दूजा करे तो डंडा बाजे*



हिंदू धर्मग्रंथों का सार, जानिए किस ग्रंथ में क्या है?

 हिंदू धर्मग्रंथों का सार, जानिए किस ग्रंथ में क्या है?

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अधिकतर हिंदुओं के पास अपने ही धर्मग्रंथ को पढ़ने की फुरसत नहीं है। वेद, उपनिषद पढ़ना तो दूर वे गीता तक को नहीं पढ़ते जबकि गीता को एक घंटे में पढ़ा जा सकता है। हालांकि कई जगह वे भागवत पुराण सुनने या रामायण का अखंड पाठ करने के लिए समय निकाल लेते हैं या घर में सत्यनारायण की कथा करवा लेते हैं। लेकिन आपको यह जानकारी होना चाहिए कि पुराण, रामायण और महाभारत हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं है। धर्मग्रंथ तो वेद ही है। 


शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है:- श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है। आओ जानते हैं कि उक्त ग्रंथों में क्या है।


वेदों में क्या है?

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वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। वेद चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

 

ऋग्वेद👉 ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।


यजुर्वेद👉 यजु अर्थात गतिशील आकाश एवं कर्म। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

 

सामवेद👉  साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसी से शास्त्रिय संगीत और नृत्य का जिक्र भी मिलता है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें संगीत के विज्ञान और मनोविज्ञान का वर्णन भी मिलता है।


अथर्वदेव👉 थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसमें भारतीय परंपरा और ज्योतिष का ज्ञान भी मिलता है।

 

उपनिषद् क्या है?

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उपनिषद वेदों का सार है। सार अर्थात निचोड़ या संक्षिप्त। उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। ईश्वर है या नहीं, आत्मा है या नहीं, ब्रह्मांड कैसा है आदि सभी गंभीर, तत्व ज्ञान, योग, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि की बातें उपनिषद में मिलेगी। उपनिषदों को प्रत्येक हिन्दुओं को पढ़ना चाहिए। इन्हें पढ़ने से ईश्वर, आत्मा, मोक्ष और जगत के बारे में सच्चा ज्ञान मिलता है।

 

वेदों के अंतिम भाग को 'वेदांत' कहते हैं। वेदांतों को ही उपनिषद कहते हैं। उपनिषद में तत्व ज्ञान की चर्चा है। उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गए हैं, जैसे- 1. ईश, 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छांदोग्य, 10. बृहदारण्यक, 11. कौषीतकि और 12. श्वेताश्वतर।


षड्दर्शन क्या है?

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वेद से निकला षड्दर्शन : वेद और उपनिषद को पढ़कर ही 6 ऋषियों ने अपना दर्शन गढ़ा है। इसे भारत का षड्दर्शन कहते हैं। दरअसल यह वेद के ज्ञान का श्रेणीकरण है। ये छह दर्शन हैं:- 1.न्याय, 2.वैशेषिक, 3.सांख्य, 4.योग, 5.मीमांसा और 6.वेदांत। वेदों के अनुसार सत्य या ईश्वर को किसी एक माध्यम से नहीं जाना जा सकता। इसीलिए वेदों ने कई मार्गों या माध्यमों की चर्चा की है।

 

गीता में क्या है?

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महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता में भी कुल 18 अध्याय हैं। 10 अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। वेदों के ज्ञान को नए तरीके से किसी ने व्यवस्थित किया है तो वह हैं भगवान श्रीकृष्ण। अत: वेदों का पॉकेट संस्करण है गीता जो हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र ग्रंथ है। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। गीता को बार बार पढ़ने के बाद ही वह समझ में आने लगती है।

 

गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म मार्ग की चर्चा की गई है। उसमें यम-नियम और धर्म-कर्म के बारे में भी बताया गया है। गीता ही कहती है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है। गीता को बार-बार पढ़ेंगे तो आपके समक्ष इसके ज्ञान का रहस्य खुलता जाएगा। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है।


गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकासक्रम, हिन्दू संदेवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म, कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी, देवता, उपासना, प्रार्थना, यम, नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है।

 

श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है, जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। गीता को अर्जुन के अलावा और संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता में श्रीकृष्ण ने- 574, अर्जुन ने- 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने- 1 श्लोक कहा है।

 

उपरोक्त ग्रंथों के ज्ञान का सार बिंदूवार :

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1.ईश्वर के बारे में :

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ब्रह्म (परमात्मा) एक ही है जिसे कुछ लोग सगुण (साकार) कुछ लोग निर्गुण (निराकार) कहते हैं। हालांकि वह अजन्मा, अप्रकट है। उसका न कोई पिता है और न ही कोई उसका पुत्र है। वह किसी के भाग्य या कर्म को नियंत्रित नहीं करता। ना कि वह किसी को दंड या पुरस्कार देता है। उसका न तो कोई प्रारंभ है और ना ही अंत। वह अनादि और अनंत है। उसकी उपस्थिति से ही संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है। सभी कुछ उसी से उत्पन्न होकर अंत में उसी में लीन हो जाता है। ब्रह्मलीन।

 

2.ब्रह्मांड के बारे में :

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यह दिखाई देने वाला जगत फैलता जा रहा है और दूसरी ओर से यह सिकुड़ता भी जा रहा है। लाखों सूर्य, तारे और धरतीयों का जन्म है तो उसका अंत भी। जो जन्मा है वह मरेगा। सभी कुछ उसी ब्रह्म से जन्में और उसी में लीन हो जाने वाले हैं। यह ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। इस जगत का संचालन उसी की शक्ति से स्वत: ही होता है। जैसे कि सूर्य के आकर्षण से ही धरती अपनी धूरी पर टिकी हुई होकर चलायमान है। उसी तरह लाखों सूर्य और तारे एक महासूर्य के आकर्षण से टिके होकर संचालित हो रहे हैं। उसी तरह लाखों महासूर्य उस एक ब्रह्मा की शक्ति से ही जगत में विद्यमान है।

 

3.आत्मा के बारे में :

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आत्मा का स्वरूप ब्रह्म (परमात्मा) के समान है। जैसे सूर्य और दीपक में जो फर्क है उसी तरह आत्मा और परमात्मा में फर्क है। आत्मा के शरीर में होने के कारण ही यह शरीर संचालित हो रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि संपूर्ण धरती, सूर्य, ग्रह नक्षत्र और तारे भी उस एक परमपिता की उपस्थिति से ही संचालित हो रहे हैं।


आत्मा का ना जन्म होता है और ना ही उसकी कोई मृत्यु है। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। यह आत्मा अजर और अमर है। आत्मा को प्रकृति द्वारा तीन शरीर मिलते हैं एक वह जो स्थूल आंखों से दिखाई देता है। दूसरा वह जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं जो कि ध्यानी को ही दिखाई देता है और तीसरा वह शरीर जिसे कारण शरीर कहते हैं उसे देखना अत्यंत ही मुश्लिल है। बस उसे वही आत्मा महसूस करती है जो कि उसमें रहती है। आप और हम दोनों ही आत्मा है हमारे नाम और शरीर अलग अलग हैं लेकिन भीतरी स्वरूप एक ही है।

 

4.स्वर्ग और नरक के बारे में :

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वेदों के अनुसार पुराणों के स्वर्ग या नर्क को गतियों से समझा जा सकता है। स्वर्ग और नर्क दो गतियां हैं। आत्मा जब देह छोड़ती है तो मूलत: दो तरह की गतियां होती है:- 1.अगति और 2. गति।


1.अगति:👉 अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।


2.गति 👉 गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है या वह अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।


अगति के चार प्रकार है-1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।


क्षिणोदर्क 👉 क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है।


भूमोदर्क 👉 भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है।


अगति 👉 अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है।


दुर्गति 👉 दुर्गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।


गति के भी 4 प्रकार :-गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं:- 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।

 

तीन मार्गों से यात्रा :

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जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। ऐसा कहते हैं कि उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ये तीन मार्ग हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।

 

5.धर्म और मोक्ष के बारे में :

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धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का अर्थ है यम और नियम को समझकर उसका पालन करना। नियम ही धर्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य होता है। हिंदु धर्म के अनुसार व्यक्ति को मोक्ष के बारे में विचार करना चाहिए। मोक्ष क्या है? स्थितप्रज्ञ आत्मा को मोक्ष मिलता है। मोक्ष का भावर्थ यह कि आत्मा शरीर नहीं है इस सत्य को पूर्णत: अनुभव करके ही अशरीरी होकर स्वयं के अस्तित्व को पूख्‍ता करना ही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।


6.व्रत और त्योहार के बारे में :

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हिन्दु धर्म के सभी व्रत, त्योहार या तीर्थ सिर्फ मोक्ष की प्राप्त हेतु ही निर्मित हुए हैं। मोक्ष तब मिलेगा जब व्यक्ति स्वस्थ रहकर प्रसन्नचित्त और खुशहाल जीवन जीएगा। व्रत से शरीर और मन स्वस्थ होता है। त्योहार से मन प्रसन्न होता है और तीर्थ से मन और मस्तिष्क में वैराग्य और आध्यात्म का जन्म होता है।

 

मौसम और ग्रह नक्षत्रों की गतियों को ध्यान में रखकर बनाए गए व्रत और त्योहार का महत्व अधिक है। व्रतों में चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा, श्रावण मास और कार्तिक मास के दिन व्रत रखना श्रेष्ठ है। यदि उपरोक्त सभी नहीं रख सकते हैं तो श्रावण के पूरे महीने व्रत रखें। त्योहारों में मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और हनुमान जन्मोत्सव ही मनाएं। पर्व में श्राद्ध और कुंभ का पर्व जरूर मनाएं।

 

व्रत करने से काया निरोगी और जीवन में शांति मिलती है। सूर्य की 12 और 12 चंद्र की संक्रांति होती है। सूर्य संक्रांतियों में उत्सव का अधिक महत्व है तो चंद्र संक्रांति में व्रतों का अधिक महत्व है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन। इसमें से श्रावण मास को व्रतों में सबसे श्रेष्ठ मास माना गया है। इसके अलावा प्रत्येक माह की एकादशी, चतुर्दशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या और अधिमास में व्रतों का अलग-अलग महत्व है। सौरमास और चंद्रमास के बीच बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। साधुजन चतुर्मास अर्थात चार महीने श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह में व्रत रखते हैं।

 

उत्सव, पर्व और त्योहार सभी का अलग-अलग अर्थ और महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र, स्मृति, पुराण और आचार संहिता में मिलता है। चंद्र और सूर्य की संक्रांतियों अनुसार कुछ त्योहार मनाएं जाते हैं। 12 सूर्य संक्रांति होती हैं जिसमें चार प्रमुख है:- मकर, मेष, तुला और कर्क। इन चार में मकर संक्रांति महत्वपूर्ण है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ, संक्रांति और कुंभ। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी, हनुमान जयंती, नवरात्री, शिवरात्री, होली, ओणम, दीपावली, गणेशचतुर्थी और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। हालांकि सभी में मकर संक्रांति और कुंभ को सर्वोच्च माना गया है।


7.तीर्थ के बारे में :

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तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धान है। सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल, भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर और बैद्यनाथ ये द्वादश ज्योतिर्लिंग है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति उज्जैन ये सप्तपुरी। उपरोक्त कहे गए तीर्थ की यात्रा ही धर्मसम्मत है।

 

8.संस्कार के बारे में :

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संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।

 

9.पाठ करने के बारे में : 

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वेदो, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है। वक्त बदला तो लोगों ने पुराणों में उल्लेखित कथा की परंपरा शुरू कर दी, जबकि वेदपाठ और गीता पाठ का अधिक महत्व है।

 

10.धर्म, कर्म और सेवा के बारे में : 

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धर्म-कर्म और सेवा का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रिय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म-कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ, 5.प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।

 

सेव का मतलब यह कि सर्व प्रथम माता-पिता, फिर बहन-बेटी, फिर भाई-बांधु की किसी भी प्रकार से सहायता करना ही धार्मिक सेवा है। इसके बाद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना पुण्य का कार्य माना गया है। इसके अलवा सभी प्राणियों, पक्षियों, गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आति को अन्न जल देना। यह सभी यज्ञ कर्म में आते हैं।


11.दान के बारे में : 

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दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। देव आराधना का दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्‍ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है। पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है। 


12.यज्ञ के बारे में : 

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यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। अग्नि जलाकर होम करना अग्निहोत्र यज्ञ है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। यह यज्ञ पिंडदान, तर्पण और सन्तानोत्पत्ति से सम्पन्न होता है। वैश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ कहलाता है। अतितिथ यज्ञ से अर्थ मेहमानों की सेवा करना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है।


13.मंदिर जाने के बारे में :

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प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए: घर में मंदिर नहीं होना चाहिए। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए। मंदिर में जाकर परिक्रमा करना चाहिए। भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। इसी प्रदक्षिण को इस्लाम धर्म ने परंपरा से अपनाया जिसे तवाफ कहते हैं। प्रदक्षिणा षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। हिन्दू सहित जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी परिक्रमा का महत्व है। इस्लाम में मक्का स्थित काबा की 7 परिक्रमा का प्रचलन है। पूजा-पाठ, तीर्थ परिक्रमा, यज्ञादि पवित्र कर्म के दौरान बिना सिले सफेद या पीत वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्राचीनकाल से हिन्दुओं में प्रचलित रही है। मंदिर जाने या संध्यावंदन के पूर्व आचमन या शुद्धि करना जरूरी है। इसे इस्लाम में वुजू कहा जाता है।

 

14.संध्यावंदनके बारे में :

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संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। संध्योपासना के चार प्रकार है- 1.प्रार्थना, 2.ध्यान, 3.कीर्तन और 4.पूजा-आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।

 

15..धर्म की सेवा के बारे में :

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धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।

 

16.मंत्र के बारे में :

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वेदों में बहुत सारे मंत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन जपने के लिए सिर्फ प्रणव और गायत्री मंत्र ही कहा गया है बाकी मंत्र किसी विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यों के लिए है। वेदों में गायत्री नाम से छंद है जिसमें हजारों मंत्र है किंतु प्रथम मंत्र को ही गायत्री मंत्र माना जाता है। उक्त मंत्र के अलावा किसी अन्य मंत्र का जाप करते रहने से समय और ऊर्जा की बर्बादी है। गायत्री मंत्र की महिमा सर्वविदित है। दूसरा मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र, लेकिन उक्त मंत्र के जप और नियम कठिन है इसे किसी जानकार से पूछकर ही जपना चाहिए।

 

17.प्रायश्चित के बार में 

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प्राचीनकाल से ही हिन्दु्ओं में मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। प्रायश्‍चित करने के महत्व को स्मृति और पुराणों में विस्तार से समझाया गया है। गुरु और शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य को प्रायश्चित करने के अलग-अलग तरीके बताते हैं। दुष्कर्म के लिए प्रायश्चित करना , तपस्या का एक दूसरा रूप है।   यह मंदिर में देवता के समक्ष 108 बार साष्टांग प्रणाम , मंदिर के इर्दगिर्द चलते हुए साष्टांग प्रणाम और कावडी अर्थात वह तपस्या जो भगवान मुरुगन को अर्पित की जाती है, जैसे कृत्यों के माध्यम से की जाती है। मूलत: अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरूणदेव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है।

 

18.दीक्षा देने के बारे में :

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दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है।  दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं।

 

यह दीक्षा देने की परंपरा जैन धर्म में भी प्राचीनकाल से रही है, हालांकि दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। अलग-अलग धर्मों में दीक्षा देने के भिन्न-भिन्न तरीके हैं।

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रंगनाथजी का मुकुट

 रंगनाथजी का मुकुट

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          एक समय श्री रंगनाथ मन्दिर के महन्त जो की प्रभु के बहुत प्रिय भक्त भी थे, अपने कुछ शिष्यों को साथ लेकर दक्षिण में तीर्थ दर्शन करते हुए एक नगर में पहुँचे। संध्या का समय था, मार्ग में बहुत ही रमणीय उपवन देख महन्त जी का मन हुआ यही कुछ देर विश्राम कर, भोजन प्रसाद बनाकर हरिनाम संकीर्तन किया जाये।

         

संयोग से वह स्थान एक वेश्या का था, वेश्या वही पास के भवन में रहती थी। महन्त जी और उनके शिष्यों को इस बात का पता नहीं था कि जिस जगह वह रुके हैं, विश्राम व भोजन प्रसादी कर रहे हैं वो स्थान एक वेश्या का है। वेश्या भी दूर से अपने भवन से हरि भक्तो की क्रियाओं का आनन्द ले रही थी।

         

द्वार पर बहुत सुन्दर-सुन्दर श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, अपने साथ अपने ठाकुर जी को भी लाये, आज मानो सन्तों के प्रभाव मात्र से पापआसक्त उस वेश्या के हृदय में भी प्रभु का प्रेम प्रस्फुटित हो रहा हो। स्वयं को बड़भागी जान उसने सन्तों को विघ्न न हो ये जानकर तथा अपने बारे में कुछ न बताकर दूर से ही अपने भवन से ठाकुर जी के दर्शनों का आनन्द लेती रही।

         

जब सभी सन्तों का भोजन प्रसाद व संकीर्तन समाप्त हुआ तो अन्त में वह वेश्या ने एक थाल में बहुत सारी स्वर्ण मुद्राएँ लेकर महन्त जी के समक्ष प्रस्तुत हुई और महन्त जी को प्रणाम किया व बताया की ये स्थान मेरा ही है, मैं यहाँ की मालकिन हूँ। महन्त जी को बड़ी प्रसन्नता हुई ये जानकर और आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने भी कहा कि यह बहुत ही रमणीय स्थान है, हमारे ठाकुर जी को भी बड़ा पसन्द आया है यह स्थान, संकीर्तन में भी बड़ा मन लगा।

     

अब वेश्या ने वो स्वर्ण से भरा हुआ थाल महन्तजी की सेवा में प्रस्तुत किया। सच्चे सन्तों का स्वाभाव होता है वो बिना जाने किसी भी अयोग्य व्यक्ति का धन या सेवा नहीं लेते हैं, और शास्त्र भी अनुमति नहीं देता है। अतः महन्त जी ने उस वेश्या से कहा हम बिना जाने ये धन स्वीकार नहीं कर सकते, आपने किस तरह से यह धन अर्जित किया है?

         

वेश्या ने भी द्वार पर आये सन्तों से झूठ न कहकर सारी बात सच-सच बता दी की, मैं एक वेश्या हूँ, समाज के आसक्त पुरुषों को रिझाती हूँ, उसी से मैंने यह धन अर्जित किया है। इतना कहकर वह महन्त जी के चरणों में पूर्ण समर्पण करते हुए फुट-फुट कर रोने लगी, व महन्तजी से श्री ठाकुरजी की भक्ति का दान देने का अनुग्रह करने लगी।

         

महन्त जी को भी दया आयी उसके इस अनुग्रह पर, लेकिन वे बड़े धर्म संकट में पड़ गये, यदि वेश्या का धन स्वीकार किया तो धर्म की हानि होगी और यदि शरण में आये हुए को स्वीकारा नहीं, मार्ग नहीं दिखाया तो भी सन्त धर्म की हानि।

         

अब महन्त जी ने अपने रंगनाथ जी का ध्यान किया और उन्ही को साक्षी कर वेश्या के सामने शर्त रखी और कहा–हम तो ये धन स्वीकार नहीं कर सकते यदि तुम हृदय से अपने इस बुरे कर्म को छोड़ना ही चाहती हो तो ऐसा करो इस पाप कर्म से अर्जित की हुई सारी सम्पत्ति को तुरन्त बेचकर जो धन आये उससे हमारे रंगनाथ जी के लिए सुन्दर सा मुकुट बनवाओ। यदि हमारे प्रभु वह मुकुट स्वीकार कर ले तो समझ लेना उन्होंने तुम्हें माफ करके अपनी कृपा प्रदान की है।

        

 वेश्या का मन तो पहले ही निर्मल हो चुका था, महन्त जी की आज्ञा शिरोधार्य कर तुरन्त ही सम्पूर्ण संपत्ति बेचकर उसने रंगनाथ जी के लिये 3 लाख रुपये का सुन्दर मुकुट बनवाया। कुछ ही दिनों में वेश्या ने मुकुट बनवाकर अपने नगर से महन्त जी के साथ रंगनाथ जी मन्दिर के लिये प्रस्थान किया।

         

मन्दिर पहुँचते ही जब यह बात समस्त ग्रामवासीयों और मन्दिर के पुजारियों को पता चली की अब वेश्या के धन से अर्जित मुकुट रंगनाथजी धारण करेंगे तो सभी अपना-अपना रोष व्यक्त करने लगे, और महन्त जी और उस वेश्या का मजाक उड़ाने लगे। महन्त जी सिद्ध पुरुष थे और रंगनाथजी के सर्वविदित प्रेमी भक्त भी थे तो किसी ने उनका विरोध करने की चेष्ठा नहीं की।

         

अब देखिये जैसे ही वो वेश्या मन्दिर में प्रवेश करने लगी, द्वार तक पहुँची ही थी की पूर्व का पाप बीच में आ गया, वेश्या वहीं "रजस्वला" हो गई... माथा पीट लिया अपना, फुट फुटकर रोने लगी, मूर्छित होके भूमि पे गिर पड़ी।

        

 'हाय महा-दुःख, सन्त की कृपा हुई, रंगनाथ जी का अनुग्रह प्राप्त होने ही वाला था की रजस्वला हो गई, मन्दिर में जाने लायक ही न रही'–सब लोग हसीं उड़ाने लगे, पुजारी भी महन्त जी को कोसने लगे।

         

अब महन्त जी भी क्या करते, उन्होंने वेश्या के हाथ से मुकुट लेकर स्वयं रंगनाथ जी के गर्भगृह प्रवेश कर श्री रंगनाथ जी को मुकुट पहनाने लगे। इधर महन्त जी बार-बार मुकुट प्रभु के मस्तक पर धराए और रंग जी धारण ही ना करें, मुकुट बार-बार रंगनाथ जी के मस्तक से गिर जाये।

         

अब तो महन्त जी भी निराश हो गये सोचने लगे हमसे ही बहुत बड़ा अपराध हुआ है, शायद प्रभु ने उस वेश्या को स्वीकार नहीं किया, इसलिये ठाकुर जी मुकुट धारण नहीं कर रहे हैं।

         

अपने भक्त को निराश देखकर रंगनाथ जी से रहा नहीं गया। अपने श्री विग्रह से ही बोल पड़े–'बाबा आप निराश मत हों, हमने तो उसी दिन उस वेश्या को स्वीकार कर लिया था जिस दिन आपने उसे आश्वासन देकर हमारे लिए मुकुट बनवाने को कहा था।'

        

महन्तजी ने कहा–'प्रभु जब स्वीकार कर ही लिया है तो फिर उस बेचारी का लाया हुआ मुकुट धारण क्यों नहीं कर रहे हैं ?'

         

रंगनाथजी बोले–'मुकुट तो हम उसी वेश्या के हाथ से धारण करेंगे, इतने प्रेम से लायी है तो पहनेगे भी उसी के हाथ से, उसे तो तू बाहर ही छोड़कर आ गया और खुद मुकुट पहना रहा है मुझको!'

         

महन्त जी ने कहा–'प्रभु जी वो रजस्वला है, वो मन्दिर में नहीं प्रवेश कर सकती।'

         

अब तो रंगनाथ जी जिद करने लगे–'इसी समय लाओ हम तो उसी के हाथ से पहनेंगे मुकुट।'

         

मन्दिर के समस्त पुजारियों ने प्रभु की ये आज्ञा सुन दाँतो तले उंगलिया दबा ली, सब विस्मित से हो गये, सम्पूर्ण मन्दिर में हाहाकार मच गया, जिसने सुना वो अचंभित हो गया। रंगनाथ जी की आज्ञा को शिरोधार्य कर सैकड़ो लोगो की उपस्थिति में उस वेश्या को सम्मान पूर्वक मन्दिर में प्रवेश करवाया गया।

         

अपने हाथो से वेश्या रंगनाथ जी को मुकुट धारण कराने लगी, नैनो से अविरल अश्रु की धाराऐं बह रही थी। कितनी अद्भुत दशा हुई होगी... ज़रा सोचो! रंगनाथ जी भक्त की इसी दशा का तो आनन्द ले रहे थे।

         

रंगनाथ जी का श्री विग्रह बहुत बड़ा होने के कारण ऊपर चढकर मुकुट पहनाना पड़ता है, भक्त के अश्रु से प्रभु के सम्पूर्ण मुखारविन्द का मानो अभिषेक हो गया। वेश्या के मुख से शब्द नहीं निकल रहे, नयन अविरल अश्रु बहा रहे है, अवर्णीय दशा है। 

         

आज रंगनाथ जी ने उस प्रेम स्वरूप भेट स्वीकार करने हेतु अपना मस्तक नीचे झुका दिया और मुकुट धारण कर उस वेश्या को वो पद प्रदान किया जिसके लिए बड़े-बड़े देवता, सन्त-महात्मा हजारो वर्ष तप-अनुष्ठान करते हैं पर उन महाप्रभु का अनुग्रह प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं।

         

कोटि-कोटि वन्दन है ऐसे सन्त को जो उस अन-अधिकारी वेश्या पर अनुग्रह कर श्री गोविन्द के चरणों का अनुसरण करवाया!

         

वास्तव में प्रभु का ये ही शाश्वत सत्य स्वरूप है, सिर्फ और सिर्फ प्रेम से ही रिझते हैं, लाख जतन करलो, हजारो नियम कायदे बनालो परन्तु यदि भाव पूर्ण भक्ति नहीं है तो सब व्यर्थ है।

         

दीनदयाल, करुणानिधान प्रभु तक जब किसी भक्त की करुणा पुकार पहुँचती है तो अपने आप को रोक नहीं पाते और दौड़े चले आते हैं निजभक्त के पास।

         

प्रभु तो स्वयं प्रेम की डोरी में स्वयं बंधने के लिए तत्पर रहते हैं परन्तु उन्हें निश्चल प्रेम में बाँधने वाला कोई विरला ही होता है।

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आज का संदेश

आज का संदेश 


       ऐसी प्रेममयी आत्म भाव से परिपूर्ण परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकना हर किसी के लिए नितान्त सरल और सम्भव है। दुनिया में हर चीज की कीमत है यहाँ बिना कीमत चुकाये कुछ भी नहीं मिलता। दूसरों का सम्मान, स्नेह, सद्भाव और सहयोग प्राप्त करने के लिए हमें वही तत्व अपने भीतर पैदा करने पड़ेंगे और उसका उपयोग दूसरों के लिए करना पड़ेगा। 


          चुम्बक अपने में आकर्षण शक्ति न हो तो पास में पड़े हुए लौह कण भी उपेक्षा का भाव दिखाते रहेंगे, उधर अभिमुख होने की कोई चेष्टा न करेंगे। प्रेम, प्रेम की कीमत पर खरीदा जा सकता है। वह एकाँगी भी हो सकता है। एक का सच्चा प्रेम दूसरे को कभी न कभी अपने अनुगत बना ही लेता है। 


         बुरे लोगों को भी यदि हम प्यार करने लगें तो उनका सुधार ही होगा। आज नहीं तो कल, हारे जितना न सही उससे कम, कुछ तो प्रेम भाव उनके मन में उपजेगा और बढ़ेगा ही। सच्चे मन से किया हुआ प्रेम कभी भी निरर्थक नहीं जाता। उसके द्वारा पत्थर की मूर्तियाँ और कागज के चित्र देवता बन कर हमें आनन्द से ओत-प्रोत कर सकते हैं तो फिर हाड़-माँस वाला सजीव प्राणी प्रत्युत्तर में सर्वथा प्रेम-विहीन कैसे बना रहेगा ?



देवता नाराज क्यों हुए

 ((((  देवता नाराज क्यों हुए ? ))))

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दिव्या के घर में बाबू नाम का एक बकरा है। उसके गले में घंटी बंधी है। वह पूरे घर में कहीं भी आजादी से घूम-फिर सकता है। 

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घर में कोई भी उसे परेशान नहीं कर सकता। किसी ने उसे जरा सा छेडऩे की कोशिश की तो वह तुरंत दौड़कर दिव्या के पास पहुंच जाता है। 

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दिव्या जब तक स्कूल से घर नहीं आती, बाबू दरवाजे पर उसका इंतजार करता है। 

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जैसे ही उसे दिव्या के आने की आहट मिली, दौड़ते हुए उसके पास पहुंच जाता है। फिर वे दोनों एक साथ घर लौटते हैं। 

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इसके बाद बाबू को हरी पत्तियां और टमाटर मिलते हैं। टमाटर खाते वक्त कई बार बाबू के पूरे मुंह में उसका रस लग जाता है। 

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तब दिव्या उसे बाल्टी से पानी डाल-डालकर नहलाती है। और बाबू के ऊपर भी पानी पड़ा नहीं कि वह शरीर को झटक कर पानी हटा देता है।

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दोनों के लिए यह एक तरह का खेल होता है। रोज दिव्या के लौटने के बाद दोपहर का यह खेल चलता है..

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लेकिन उस रोज ऐसा नहीं हुआ। दिव्या स्कूल से लौटी तो बाबू उसे लेने नहीं आया। घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि 

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दादा-दादी बाबू को पास के मंदिर तक ले गए हैं। थकी-हारी थी, इसलिए जल्दी ही सो गई। 

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शाम होते तक जब उसकी आंख खुली तो लगा जैसे बाबू उसके तलवे चाट रहा है। वह अक्सर ही उसे उठाने के लिए ऐसा किया करता था।

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दिव्या हड़बड़ाकर उठ बैठी। लेकिन देखा कि उसके पैरों के पास तो दादा जी बैठे हैं, जो गीले हाथ से उसके तलवे सहला रहे थे। 

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उन्होंने दिव्या से कहा कि वह उनके साथ मंदिर चले। दोनों मंदिर पहुंचे तो देखा वहां भारी भीड़ के बीच बाबू खड़ा है। 

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उसके माथे पर तिलक और गले में माला थी। भीड़ ने उसके ऊपर कई बाल्टी पानी डाला था।

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सूरज डूबने में थोड़ा ही वक्त था। बलि देने के लिए बाबू को वहां लाया गया था।

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गांव वालों की मान्यता थी कि जब तक बकरा शरीर पर डाले गए पानी को झड़ा नहीं देता तब तक बलि नहीं दी जा सकती।

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और बाबू तो चुपचाप खड़ा था। लोग इसे बुरे साए का प्रभाव मान रहे थे।

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दिव्या पहुंची तो लोगों को कुछ आस बंधी। बड़े-बुजुर्गों ने बच्ची से आग्रह किया कि वह बाबू को शरीर से पानी झटकने के लिए तैयार करे।

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दिव्या से कहा गया कि बाबू ने शरीर से पानी नहीं झड़ाया तो बारिश के देवता नाराज हो जाएंगे। 

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उसका मन घबरा रहा था लेकिन उसने बड़ों की बात मान ली। बाबू के पास गई। उसे सहलाया। एक टमाटर खिलाया।

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बाबू ने चुपचाप टमाटर खाया लेकिन रस इस बार भी उसके चेहरे पर लग गया। दिव्या ने पानी से उसका चेहरा पोंछा। 

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बाबू चुपचाप दिव्या को देखे जा रहा था। दोनों की आंखें भीगी थीं। उनके बीच क्या बात हुई, किसी को समझ नहीं आया। लेकिन तभी सबने देखा कि बाबू ने जोर से शरीर हिलाया और पूरा पानी शरीर से झटक दिया। 

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भीड़ खुशी से उछल पड़ी। बाबू के गलेे सेे घंटी और रस्सी खोलकर दिव्या को दे दी गई। फिर उसे मंदिर के पीछे ले जाया गया। 

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दो मिनट बाद ही बाबू की चीख सुनाई दी। फिर सब शांत हो गया। 

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दादा जी के साथ दिव्या चुपचाप घर लौट आई थी।

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उस रात गांव में भोज हुआ। लेकिन अगली सुबह पूरा गांव एक बार फिर इकट्ठा था। दिव्या की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए। 

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गांव वालों में से किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि आखिर अब कौन से देवता नाराज हुए। जिन्होंने उस छोटी सी बच्ची को दुनिया से उठा लिया।

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मजबूरी कोई भी हो। मासूम बच्चों के भरोसे को तोडऩे का हम में से किसी को हक नहीं। बच्चों को समझ पाने की जहां तक बात है, तो लगता है हमारे समाज को अभी से मन से सोचना है कि उनकी भी अपनी दुनिया है..


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 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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Thursday, June 27, 2024

ब्राह्मण के बाएँ कन्धे पर रखा वस्त्र आपने देखा होगा,

ब्राह्मण के बाएँ कन्धे पर रखा वस्त्र आपने देखा होगा, जिसे उत्तरीय वस्त्र कहा जाता है, पर आजकल मनमाना आचरण करने के कारण कदाचित् इसे लोग दायें कन्धे पर रखने लग गये हैं, जो अपसव्य पितृकर्म में प्रयोग होता है। उत्तरीय वस्त्र का बहुत महत्त्व है, शास्त्र में उत्तरीय का निर्देश प्राप्त हुआ है, उत्तरीय अर्थात् अपने उत्तर भाग में, अर्थात् बाएँ स्कन्ध पर इसे रखा जाता है। 

उत्तरीय महत्त्वः-  उत्तरीय व्ययपेतश्च तत्कृतं निष्फलं भवेत्। वृद्ध मनु 

होमदेवार्चनाद्यासु क्रियासु पठने तथा। 

नैकवस्त्रः प्रवर्तेत द्विजो नाचमने जपे॥ विष्णुपुराणम् 

नैकवस्त्रो द्विजः कुर्याद्भोजनं च सुरार्चनम्। व्याघ्रपाद

एकवस्त्रं विनापात्रं सव्ययज्ञोपवीतकम्। 

प्रत्यक्षं तु नदी शौचं कुर्वञ्छूद्रत्वमाप्नुयात्॥ ‘’आह्निक कारिकासु’’। 

किसी भी पूजा में ऐसा उत्तरीय वस्त्र  (पटका)  बाएँ कन्धे पर अवश्य लें।

नोट:- इस उत्तरीय को दक्षिण स्कन्ध पर रखने की ये परम्परा सबसे पहले मोरारी बापू ने की थी, जो सर्वथा अशास्त्रीय है।

   ❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️


Wednesday, June 26, 2024

आपकी सन्तानों के लिए विरासत

 आपकी सन्तानों के लिए विरासत

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मृत्यु के समय, एक व्यक्ति टॉम स्मिथ ने अपने बच्चों को बुलाया और अपने पदचिह्नों पर चलने की सलाह दी, ताकि उनको अपने हर कार्य में मानसिक शांति मिले। 


उसकी बेटी सारा ने कहा, "डैडी, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आप अपने बैंक में एक पैसा भी छोड़े बिना मर रहे हैं। दूसरे पिता, जिनको आप भ्रष्ट और सार्वजनिक धन के चोर बताते हैं, अपने बच्चों के लिए घर और सम्पत्ति छोड़कर जाते हैं। यह घर भी जिसमें हम रहते हैं किराये का है। 

सॉरी, मैं आपका अनुसरण नहीं कर सकती। आप जाइए, हमें अपना मार्ग स्वयं बनाने दीजिए।"


कुछ क्षण बाद उनके पिता ने अपने प्राण त्याग दिये। 


तीन साल बाद, सारा एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में इंटरव्यू देने गई। इंटरव्यू में कमेटी के चेयरमैन ने पूछा, "तुम कौन सी स्मिथ हो?"


सारा ने उत्तर दिया, "मैं सारा स्मिथ हूँ। मेरे पिता टॉम स्मिथ अब नहीं रहे।"


चेयरमैन ने उसकी बात काट दी, "हे भगवान! तुम टॉम स्मिथ की पुत्री हो?" 


वे कमेटी के अन्य सदस्यों की ओर घूमकर बोले, "यह आदमी स्मिथ वह था जिसने प्रशासकों के संस्थान में मेरे सदस्यता फ़ार्म पर हस्ताक्षर किये थे और उसकी संस्तुति से ही मैं वह स्थान पा सका हूँ, जहाँ मैं आज हूँ। उसने यह सब कुछ भी बदले में लिये बिना किया था। मैं उसका पता भी नहीं जानता था और वह भी मुझे कभी नहीं जानता था। पर उसने मेरे लिए यह सब किया था!"


फिर वे सारा की ओर मुड़े, "मुझे तुमसे कोई सवाल नहीं पूछना है। तुम स्वयं को इस पद पर चुना हुआ मान लो। कल आना, तुम्हारा नियुक्ति पत्र तैयार मिलेगा।"


सारा स्मिथ उस कम्पनी में कॉरपोरेट मामलों की प्रबंधक बन गई। उसे ड्राइवर सहित दो कारें, ऑफिस से जुड़ा हुआ डुप्लेक्स मकान और एक लाख पाउंड प्रतिमाह का वेतन अन्य भत्तों और ख़र्चों के साथ मिला। 


उस कम्पनी में दो साल कार्य करने के बाद, एक दिन कम्पनी का प्रबंध निदेशक अमेरिका से आया। उसकी इच्छा त्यागपत्र देने और अपने बदले किसी अन्य को पद देने की थी। उसे एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो बहुत सत्यनिष्ठ (ईमानदार) हो। कम्पनी के सलाहकार ने उस पद के लिए सारा स्मिथ को नामित किया। 


एक इंटरव्यू में सारा से उसकी सफलता का राज पूछा गया। आँखों में आँसू भरकर उसने उत्तर दिया, "मेरे पिता ने मेरे लिए मार्ग खोला था। उनकी मृत्यु के बाद ही मुझे पता चला कि वे वित्तीय दृष्टि से निर्धन थे, लेकिन प्रामाणिकता, अनुशासन और सत्यनिष्ठा में वे बहुत ही धनी थे।"


फिर उससे पूछा गया कि वह रो क्यों रही है, क्योंकि अब वह बच्ची नहीं रही कि इतने समय बाद पिता को अभी भी याद करती हो। 


उसने उत्तर दिया, "मृत्यु के समय, मैंने ईमानदार और प्रामाणिक होने के कारण अपने पिता का अपमान किया था। मुझे आशा है कि अब वे अपनी क़ब्र में मुझे क्षमा कर देंगे। मैंने यह सब प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं किया, उन्होंने ही मेरे लिए यह सब किया था।"


अन्त में उससे पूछा गया, "क्या तुम अपने पिता के पदचिह्नों पर चलोगी जैसा कि उन्होंने कहा था?"


उसका सीधा उत्तर था, "मैं अब अपने पिता की पूजा करती हूँ, उनका बड़ा सा चित्र मेरे रहने के कमरे में और घर के प्रवेश द्वार पर लगा है। मेरे लिए भगवान के बाद उनका ही स्थान है।"


क्या आप टॉम स्मिथ की तरह हैं? नाम कमाना सरल नहीं होता। इसका पुरस्कार जल्दी नहीं मिलता, पर देर सवेर मिलेगा ही। और वह हमेशा बना रहेगा। *ईमानदारी, अनुशासन, आत्मनियंत्रण और ईश्वर से डरना ही किसी व्यक्ति को धनी बनाते हैं, मोटा बैंक खाता नहीं। अपने बच्चों के लिए एक अच्छी विरासत छोड़कर जाइए।*


समाज में बदलाव लाने के लिए कृपया इस सत्य घटना को अपने प्रिय व्यक्तियों के साथ साझा कीजिए। 

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27 जून गुरुवार 2024

 *🌻प्रातः वंदन🌻*

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*27 जून गुरुवार 2024*

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*बिना प्रयास किए*

*आप सिर्फ नीचे गिर सकते हैं*

*ऊपर नहीं उठ सकते*

*यह गुरुत्वाकर्षण का नियम*

 *भी है और जीवन का भी*

*मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूंजी*

*उनके अच्छे विचार है,क्योंकि*

*धन और बल किसी को भी*

*गलत राह पर ले जा सकते हैं*

*किन्तु  अच्छे विचार सदैव अच्छे*

*कार्यो के लिए ही प्रेरित करेंगे*

*सबसे बेहतरीन नजर वो है*

*जो अपनी कमियों को देख सके*

*क्योंकि नींद तो रोज ही खुलती है*

*पर आँखे कभी-कभी ही...!*


      *|| सुप्रभात वंदन  उज्जैन ||*

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महाप्रभु का महा रहस्य

 भगवान् कृष्ण ने जब देह छोड़ा तो उनका अंतिम संस्कार किया गया , उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था और वो बिलकुल सुरक्षित था , उनका हृदय आज तक सुरक्षित है जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है और उसी तरह धड़कता है , ये बात बहुत कम लोगो को पता है


महाप्रभु का महा रहस्य

सोने की झाड़ू से होती है सफाई......


महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है.... पुरी(उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है... मगर रहस्य ऐसे है कि आजतक कोई न जान पाया


हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है। लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है...उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता...


मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है...पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है...ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता...इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है...


ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...मगर ये क्या है ,कोई नही जानता... ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है... 


मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ??? 


कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथमे लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था...आंखों में पट्टी थी...हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए...


आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है...


भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देंगी


आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उड़ते देखे होंगे, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। 


झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशामे लहराता है


दिन में किसी भी समय भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।


भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा


इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है, जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह आपकी तरफ दीखता है।


भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है, इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है।


भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।


ये सब बड़े आश्चर्य की बात हैं..

     🚩 जय श्री जगन्नाथ 🚩




श्री हनुमान स्तुति

 🚩🌷 श्री हनुमान स्तुति 🌷🚩

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🚩श्लोक-🚩

🙏प्रात: स्मरामि हनुमन्तमनन्त वीर्यं

🙏श्री रामचन्द्र चरणाम्बुज चञ्चरीकम्।

🙏लंकापुरीदहननन्दित  देववृन्दं

🙏सर्वार्थसिद्वसदनं प्रथितप्रभावम्।।


🚩 अर्थ- 🚩

जो श्रीरामचंद्र जी के चरणों के भ्रमर हैं, जिन्होंने लंकापुरी को दहन करके देवों को आनन्द प्रदान किया, जो समस्त अर्थ सिद्धियों के भण्डार और लोक- प्रसिद्ध प्रभावशाली हैं, उन अनन्त पराक्रमशाली श्रीहनुमान जी का मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूं।


🚩श्रीहनुमान जी के १२ नामों की स्तुति-🚩


श्रीहनुमान जी की स्तुति जिसमें उनके बारह नामों का उल्लेख मिलता है इस प्रकार है-


हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः।

रामेष्टःफाल्गुनसखःपिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः।।


उदधिक्रमणश्चैवसीताशोकविनाशनः।

लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्यदर्पहा।।


एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः।

स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्।।


तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।

राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।


(आनंद रामायण- ८ / १३ / ८ - ११)


🚩 अर्थ-🚩

उनका एक नाम तो हनुमान है ही, दूसरा अंजनीसूनु, तीसरा वायुपुत्र, चौथा महाबल,पांचवां रामेष्ट (राम जी के प्रिय), छठा फाल्गुनसख (अर्जुन के मित्र), सातवां पिंगाक्ष (भूरे नेत्र वाले) आठवां अमितविक्रम,नौवां उदधिक्रमण (समुद्र को लांघने वाले), दसवां सीताशोकविनाशन (सीताजी के शोक को नाश करने वाले), ग्यारहवां लक्ष्मणप्राणदाता (लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले) और बारहवां नाम है- दशग्रीवदर्पहा(रावण के घमंड को चूर करने वाले) ये बारह नाम श्री हनुमानजी के गुणों के द्योतक हैं।


प्रभु श्रीराम और देवी सीता के प्रति जो सेवा कार्य उनके द्वारा हुए हैं, ये सभी नाम उनके परिचायक हैं और यही श्रीहनुमान की स्तुति है। इन नामों का जो रात्रि में सोने के समय या प्रातःकाल उठने पर अथवा यात्रारम्भ के समय पाठ करता है, उस व्यक्ति के सभी भय दूर हो जाते हैं।👏👏👏👏👏👏👏


           🚩🌷।। श्रीहनुमते नमः।।🌷🚩




रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई"। इस चौपाई में भरत का नाम लिया गया है, लक्ष्मण का क्यों नहीं? क्या इस चौपाई में भी रहस्य है

 "रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई"। इस चौपाई में भरत का नाम लिया गया है, लक्ष्मण का क्यों नहीं? क्या इस चौपाई में भी रहस्य है

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मैंने अपनी सासु माँ से पूछा तो जवाब मिला कि जब श्री राम जी वनवास में थे तो लक्ष्मण जी उनके साथ थे और भरत जी दूर अयोध्या में। जब कोई व्यक्ति हमसे दूर होता है तो हम हमेशा उसका स्मरण करते हैं और जब भरत जी जैसे भाई हो तो स्मृति पटल से उनकी छबि हट ही नहीं सकती इसलिए संक्षिप्त में हनुमान जी की प्रशंसा को पराकाष्ठा पर पहुंचाने के लिए श्री राम के मुख से भरत जी का ही नाम निकला।


श्री राम भद्राचार्य जी के अनुसार जब पुत्र प्राप्ति की कामना से खीर भोग के पात्र दशरथ जी ने अपनी तीनों रानियों को दिए तो कैकयी वाले पात्र से ,एक चील अपनी चोंच में खीर लेकर माता अंजना जी को प्रसाद स्वरूप दे दी और उस समय माता अंजना ने पुत्र प्राप्ति की कामना से वो खीर ग्रहण की। इस प्रकार हनुमान जी और भरत जी समान हो गए। इसलिए संपूर्ण रहस्य के ज्ञाता श्री राम जी ने हनुमान जी की तुलना भरत जी से की।




Tuesday, June 25, 2024

क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार...... ???

 क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार......  ????

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ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा से भगवान श्री जगन्नाथ आज भी रोगी हो जाते हैं। इस वर्ष 21 जून शुक्रवार से अगले 15 दिनों तक जगन्नाथ भगवान बीमार रहते हैं। 15 दिन के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और उनकी रसोई बंद कर दी जाती है। भगवान् जगन्नाथ के बीमाऱ होने से जुडी एक प्राचीन कथा इस प्रकार हैं।


उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे , श्री माधव दास जी  अकेले रहते थे, कोई संसार से इनका लेना देना नही।


अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे और उन्ही को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे।


प्रभु इनके साथ अनेक लीलाए किया करते थे | प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे |


एक बार माधव दास जी को अतिसार( उलटी – दस्त ) का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे।


कोई कहे महाराजजी हम कर दे आपकी सेवा तो कहते नही मेरे तो एक जगन्नाथ ही है वही मेरी रक्षा करेंगे । ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने बेठने में भी असमर्थ हो गये ,


 तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर इनके घर पहुचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दे।


भक्तो के लिए अपने क्या क्या नही किया…

क्यूंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था की उन्हें पता भी नही चलता था की कब मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे।


उन वस्त्रो को जगन्नाथ भगवान अपने हाथो से साफ करते थे, उनके पुरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे।


कोई अपना भी इतनी सेवा नही कर सके, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की करी है।


भक्त माधव दास जी पर प्रभु का स्नेह.........


जब माधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लीया की यह तो मेरे प्रभु ही हैं।

एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से –


 “प्रभु आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता”


ठाकुरजी कहते हा देखो माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो प्रारब्द्ध होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है।


अगर उसको काटोगे तो इस जन्म में नही पर उसको भोगने के लिए फिर तुम्हे अगला जन्म लेना पड़ेगा और मै नही चाहता की मेरे भक्त को ज़रा से प्रारब्द्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े,


 इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नही टाल सकता 


भक्तो के सहायक बन उनको प्रारब्द्ध के दुखो से, कष्टों से सहज ही पार कर देते है प्रभु

अब तुम्हारे प्रारब्द्ध में ये 15 दिन का रोग और बचा है, इसलिए 15 दिन का रोग तू मुझे दे दे

15 दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदास जी से ले लिया


आज भी इसलिए जगन्नाथ भगवान होते है बीमार.......


वो तो हो गयी तब की बात पर भक्त वत्सलता देखो आज भी वर्ष में एक बार जगन्नाथ भगवान को स्नान कराया जाता है ( जिसे स्नान यात्रा कहते है )


स्नान यात्रा करने के बाद हर साल 15 दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते है।


15 दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है  कभी भी जगनाथ भगवान की रसोई बंद नही होती पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बंद कर दी जाती है।


 भगवान को 56 भोग नही खिलाया जाता , ( बीमार हो तो परहेज़ तो रखना पड़ेगा ) 


प्रभु को लगाया जाता है काढ़ो का भोग.........


15 दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़ो का भोग लगता है। इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मंदिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं।


काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगया जाता है। बीमार के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है।


भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए है और अब 15 दिनों तक आराम करेंगे। आराम के लिए 15 दिन तक मंदिरों पट भी बंद कर दिए जाते है और उनकी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएं।


जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते है उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है, जिसके दर्शन हेतु असंख्य भक्त उमड़ते है।


खुद पे तकलीफ ले कर अपने भक्तो का जीवन सुखमयी बनाये। ऐसे तो सिर्फ मेरे भगवान ही हो सकते है।


जय जगन्नाथ जी

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प्रेरक भक्ति ज्ञान सिमरन

 प्रेरक भक्ति ज्ञान सिमरन

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    ऐक बार की बात है, ऐक भक्त के दिल में आया कि गुरु महाराज जी को रात में देखना चाहिए कि क्या वो भी भजन सिमरन करते  हैं। 


वो रात को गुरु महाराज जी के कमरे की खिड़की के पास खड़ा हो गया।


 गुरु महाराज जी  रात 9:30 तक भोजन और बाकी काम करके अपने कमरे में आ गये।


 वो भक्त देखता है कि गुरु महाराज जी ऐक पैर पर खड़े हो कर भजन सिमरन करने लग गये।


 वो कितनी देर तक देखता रहा और फिर थक कर खिड़की के बाहर ही सो गया। 


3 घंटे बाद जब उसकी आंख खुली तो वो देखता है कि गुरु महाराज जी अभी भी ऐक पैर पर खड़े भजन सिमरन कर रहे हैं, फिर थोड़ी देर बाद गुरु महाराज जी भजन सिमरन से उठ कर थोड़ी देर कमरे में ही इधर उधर घूमें और फिर दोनों पैरो पर खड़े होकर भजन सिमरन करने लगे।


 वो भक्त देखता रहा और देखते-देखते उसकी आँख लग गई और वो सो गया। 


जब फिर उसकी आँख खुली तो 4 घंटे बीत चुके थे और अब गुरु महाराज जी बैठ कर भजन सिमरन कर रहे थे। 


थोड़ी देर में सुबह हो गई और गुरु महाराज जी उठ कर तैयार हुए और सुबह की सैर पर चले गये।


वो भक्त भी गुरु महाराज जी के पीछे ही चल गया और रास्ते में गुरु महाराज जी  को रोक कर हाथ जोड़ कर बोलता है कि गुरु महाराज जी  मैं सारी रात आपको खिड़की से देख रहा था कि आप रात में कितना भजन सिमरन करते हो।


गुरु महाराज जी हंस पड़े और बोले:- बेटा  देख लिया तुमने फिर?


वो भक्त शर्मिंदा हुआ और बोला कि गुरु महाराज जी देख लिया पर मुझे ऐक बात समझ नहीं आई कि आप पहले ऐक पैर पर खड़े होकर भजन सिमरन करते रहे फिर दोनों पैरों पर और आखिर में बैठ कर जैसे कि भजन सिमरन करने को आप बोलते हो, ऐसा क्यूँ?


 गुरु महाराज जी बोले बेटा ऐक पैर पर खड़े होकर मुझे उन सत्संगियो के लिए खुद भजन सिमरन करना पड़ता है जिन्होंने नाम दान लिया है मगर बिलकुल भी भजन सिमरन नहीं करते, दोनों पैरो पर खड़े होकर मैं उन सत्संगियो के लिए भजन सिमरन करता हूँ जो भजन सिमरन में तो  बैठते हैं मगर पूरा समय नहीं देते।


 बेटा जिनको नाम दान मिला है, उनका जवाब सतपुरख को मुझे देना पडता है, क्यूंकि मैंने उनकी जिम्मेदारी ली है नाम दान देकर।


 और आखिर में मैं बैठ कर भजन सिमरन करता हूँ, वो मैं खुद के लिए करता हूँ, क्यूंकि मेरे गुरु ने मुझे नाम दान दिया था और मैं नहीं चाहता की उनको मेरी जवाबदारी देनी पड़े।


वो भक्त ये सब सुनकर ऐक दम सुन्न खड़ा रह गया ।


तो मित्रों अगर हम लोगों को नाम दान मिला है तो पूरा समय देना चाहिए, क्यूंकि हमारे कर्मों का लेखा जोखा हमारे गुरु नाम दान देते समय अपने पास ले लेते हैं, और उनको हम पर विश्वास होता है कि हम भजन सिमरन को समय देंगे, इसलिए हमें उनके विश्वास पर पूरा उतरना चाहिए, क्यूंकि जवाबदारी हमारे सतगुरु को देनी पड़ती है ।


 इसी लिये हमें भजन सिमरन  रोज करना चाहिए।

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क्रोध की भूमि का इतिहास

 || क्रोध  की भूमि का इतिहास ||

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   मंगलनाथ उज्जैन से-

जब महाभारत का युद्घ होने वाला था। उस समय पर श्री कृष्ण और अर्जुन युद्घ के लिए भूमि देखने के लिए निकल पड़े, घूमते घूमते वो कुरुक्षेत्र पहुँच गए। वहां उन्होंने देखा एक किसान और साथ में उसका बेटा दोनों खेती कर रहे थे, तभी अचानक एक साँप ने उस किसान के बेटे को डस लिया, उस किसान ने अपने बेटे की लाश को खेत से बाहर कर दिया और फ़िर से खेती करने लगा।


आगे भगवान ने देखा एक महिला खाना ले कर आ रही थी, श्री कृष्ण जी ने उससे पुछा तुम कहा जा रही हो, उसने कहाँ अपने पति और ससुर के लिए खाना ले कर जा रही हूँ।


श्री कृष्ण जी बोले तुम्हारे पति को तो साँप ने डस लिया है और तुम्हारे ससुर ने उसकी लाश को खेत से बाहर कर दिया है। और फ़िर खेती करने लगें हैं। ये सुनते ही वो महिला वही बैठ गई और खाना खाने लग गई, अपने पति के हिस्से का खाना खाकर, वो ससुर का खाना ले कर आगे बढ़ गई।


श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा की यही जगह सही हैं युद्घ के लिए, यहाँ किसी को किसी से कोई मतलब नही है, सब अपने बारे में सोचते हैं।


मित्रों अगर आज भगवान श्री कृष्ण को युद्घ के लिए भूमि देखने जाना पड़े, तो आसानी से मिल जायेगी, क्योंकि हर जगह सब अपने बारे में ही सोचते हैं। क्योंकि इस जगत में करूणा का नाश हो गया है।


अपनी पीडा का मूल्य अपनो की पीडा से अधिक है। और अपनो की पीड़ा का मूल्य समाज की पीड़ा से अधिक है। करूणा सूख गई है इस जगत में से। और जब करूणा नही होती समाज मे तो लोग एक दूसरे से बन्धते नही हैं।केवल अपने सुख के लिए जीते हैं। समाज मे जब करूणा का नाश हो जाये तो समाज स्वंय अपने लिए युद्ध निर्मित कर लेता है।


          || नर नारायण की जय हो  ||




26 जून बुधवार 2024

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*26 जून बुधवार 2024*

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*शुभ कार्य को कभी भी कल पर नहीं टालना*

*चाहिए मनुष्य मन के संकल्प और विकल्प*

*पानी के बुलबुले की तरह ही एक क्षण में*

*बनते  दूसरे ही क्षण में मिटते हैं!*

*इसलिए हमारे महापुरुषों ने निर्णय दिया है*

*कि बुरा करने का विचार आये  कल पर*

*टालो और कभी अच्छा करने का विचार*

*आये अभी कर डालो किसी भी कार्य को*

*करने से पूर्व विवेक पूर्वक निर्णय लेना*

*बुद्धिमत्ता मानी गई है प्रत्येक कार्य को*

*अच्छे से सोचकर ही करना चाहिए मन*

*की स्थिति सदा एक जैसी नहीं रहती जो*

*शुभ संकल्प अभी मन में आया वह कल*

*नहीं आये अच्छे को आज करो और बुरे*

*को कल पर टाल दो ये भी सुखी और*

*सफल जीवन की एक कुंजी है।*


       


बुधवार को श्रीगणेश का इस चीज से करें। अभिषेक, सारे विघ्न हरेंगे गणराज

 बुधवार को श्रीगणेश का इस चीज से करें। अभिषेक, सारे विघ्न हरेंगे गणराज ।

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बुधवार का दिन भगवान श्री गणेश की पूजा-पाठ की दिन माना गया है । कहा जाता है। कि इस दिन श्री गणेश का विशेष अभिषेक करने से वे प्रसन्न होकर भक्तों के सारे विघ्नों को हर लेते हैं। एवं भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं । शास्त्र भी कहता हैं कि कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व श्री गणेश जी की पूजा करने से कार्य का सफल होना निश्चित हो जाता हैं । अगर कोई बुधवार के दिन कुछ विशेष उपाय करते हैं तो उनकी परेशानियां दूर होने साथ ही आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो जाती हैं ।


1- बुधवार के दिन घर में ही शुद्ध मिट्टी के गणेश जी बनाकर या किसी बहुत प्राचीन गणेश मंदिर में जाकर ताजे गन्ने के जूस या 108 सफेद दुर्वा से- ऊँ गं गणपतये नमः मंत्र बोलते हुए, अभिषेक करने पर व्यक्ति की कितनी ही बड़ी समस्या क्यों ना हो भगवान श्री गणेश जी कुछ ही दिनों में दूर कर देते हैं ।


2- बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में जाकर उनसे सभी परेशानियां दूर करने के लिए प्रार्थना करें ।


3- बुधवार के दिन हाथी को हरा चारा से जीवन में आ रही परेशानियां कुछ दिनों में ही दूर हो जाती हैं ।


4- बुधवार सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कार्यों से निवृत होकर एक कांसे की थाली लें। थाली में चंदन से ऊँ गं गणपतयै नम: लिखें। उसके बाद थाली में पांच बूंदी के लड्डू रखकर नजदीक के श्रीगणेश मंदिर में दान करें। इससे धन लाभ के योग बनते हैं।


5- बुधवार के दि 21 गुड़ की ढेली के साथ दूर्वा किसी भी श्रीगणेश मंदिर में जाकर भगवान गणेश को अर्पित करें । ऐसा करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।


6- धन प्राप्ति के की इच्छा के लिए बुधवार गणेशजी को शुद्ध घी और गुड़ का भोग लगाने से धन की प्राप्ति के योग बनने लगते हैं ।


ॐ रां रामाय नमः