|| भगवान विष्णु को सुक्राचार्य का श्राप-||
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जाने उज्जैन से-
शुक्राचार्य जी ने भगवान शंकर से प्राप्त की थी
मृतसंजीवनी विद्या
भगवान शिवजी की स्तुति कर भृगुनन्दन कवि ने कहा- ब्रह्मादिक ऋषियों को भी जो विद्या प्राप्त नहीं है,ऐसी विद्या मैं आपसे प्राप्त करना चाहता हूं। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे मृत प्राणियों को संजीवित कर देने वाली विद्या प्रदान करें।'
यदि तुष्टो महादेव विद्यां देहि महेश्वर।
यया जीवन्ति संप्राप्ता मृत्युं संख्येऽपि जन्तव:।।
(स्कन्दपुराण)
काशी जैसे अविमुक्त क्षेत्र में किए गए पुण्यों के फल स्वरूप मैं तुम्हें पुत्र रूप में देखता हूँ। जो मेरे तपोबल से निर्मित मृतसंजीवनी विद्या है, उसे मैं तुमको प्रदान करता हूँ।भगवान शिव द्वारा कवि (शुक्राचार्य) को मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाली मृतसंजीवनी विद्या प्रदान की।साथ ही यह वर दिया कि 'तुम आकाश में अत्यन्त दीप्ति मान् तारारूप से स्थित होओगे। आकाश में तुमारा तेज सब नक्षत्रों में सबसे उज्जवल होगा। जो स्त्री और पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहने पर यात्रा करेंगे,उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि पड़ने से नष्ट हो जाएगा। तुम्हारे उदयकाल में ही मनुष्यों के विवाह आदि शुभ कार्य फलप्रद होंगे।
दानी कहुँ संकर-सम नाहीं। दीन-दयालु दिबोई भावै,
(विनयपत्रिका)
अब आगे पढ़े कथा-
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भगवान विष्णु को सात बार अवतार लेना पड़ा, इसका एक कारण मानव जाति का कल्याण करना तो था ही इसके साथ ही इन अवतारों के पीछे भगवान विष्णु को दिए गए श्राप भी हैं, इस श्राप के कारण भगवान को सात बार अवतार लेना पड़ा।
आखिर भगवान विष्णु को श्राप किसने
दिया तो आइए जानते है इसके बारे में....
हरवंश पुराण में उल्लेखित एक कथा के अनुसार एक बार दानव गुरु शुक्र भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पर गए तथा उनसे दानवों को देवताओं से सुरक्षित रखने का उपाय पूछा, शिव शुक्र से बोले की तप ही एक मात्र ऐसा साधन है जिसके प्रभाव से तुम दानवां को देवताओ से सुरक्षित रख सकते हो। भगवान शिव के आज्ञा से शुक्र तप करने चले गए तथा कई वर्षां तक उन्होंने घोर तप किया।
जब शुक्र तप में लीन थे उस समय देवताओं और असुरों के मध्य बहुत भयंकर युद्ध हुआ व इस युद्ध में भगवान विष्णु ने शुक्र की माता का वध कर दिया। जब शुक्र का तप पूरा हुआ तो उन्हें वरदान स्वरूप मृत संजीवनी की दीक्षा प्राप्त हुई, इस शक्ति के प्रभाव से वे मृत व्यक्ति को पुनः जीवित कर सकते थे।तपस्या के बाद वापस अपने आश्रम में लौटने पर जब उन्होंने देखा की उनकी माता मृत पड़ी है तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने तपो बल के प्रभाव से यह जान लिया की उनकी माता की मृत्यु का कारण भगवान विष्णु हैं। उन्होंने क्रोध में आकर भगवान विष्णु को श्राप देते हुए कहा की विष्णु तुम्हें सात बार पृथ्वी में जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त होना पड़ेगा।
इसके बाद उन्होंने मृत संजीवनी मंत्र से अपनी माता सहित सभी देत्यों को पुनः जीवित कर दिया और स्वर्ग
में आक्रमण की तैयारी करने लगे। शुक्र द्वारा दिया गया श्राप भगवान विष्णु के लिए वरदान सिद्ध हुआ और दानवों के लिए श्राप, क्योंकि भगवान विष्णु ने सात
बार पृथ्वी में मानव रूप में जन्म लेकर दानवों का संहार किया।
|| विष्णु भगवान की जय हो ||

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