"रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई"। इस चौपाई में भरत का नाम लिया गया है, लक्ष्मण का क्यों नहीं? क्या इस चौपाई में भी रहस्य है
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मैंने अपनी सासु माँ से पूछा तो जवाब मिला कि जब श्री राम जी वनवास में थे तो लक्ष्मण जी उनके साथ थे और भरत जी दूर अयोध्या में। जब कोई व्यक्ति हमसे दूर होता है तो हम हमेशा उसका स्मरण करते हैं और जब भरत जी जैसे भाई हो तो स्मृति पटल से उनकी छबि हट ही नहीं सकती इसलिए संक्षिप्त में हनुमान जी की प्रशंसा को पराकाष्ठा पर पहुंचाने के लिए श्री राम के मुख से भरत जी का ही नाम निकला।
श्री राम भद्राचार्य जी के अनुसार जब पुत्र प्राप्ति की कामना से खीर भोग के पात्र दशरथ जी ने अपनी तीनों रानियों को दिए तो कैकयी वाले पात्र से ,एक चील अपनी चोंच में खीर लेकर माता अंजना जी को प्रसाद स्वरूप दे दी और उस समय माता अंजना ने पुत्र प्राप्ति की कामना से वो खीर ग्रहण की। इस प्रकार हनुमान जी और भरत जी समान हो गए। इसलिए संपूर्ण रहस्य के ज्ञाता श्री राम जी ने हनुमान जी की तुलना भरत जी से की।

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