आज का संदेश
कई लोग संतोष की आड़ में अपनी अकर्मण्यता को छिपा लेते हैं तो कई लोगों द्वारा प्रयत्न ना करना ही संतोष समझ लिया जाता है। संतोष का अर्थ ये नहीं है कि प्रयत्न ही ना किया जाए अपितु प्रयत्न करने के बाद जो भी मिल जाए उसमें प्रसन्न रहना ही संतोष है।
प्रयत्न करने अथवा पुरुषार्थ करने में असंतोषी रहो, प्रयास की अंतिम सीमाओं तक जाओ। एक क्षण के लिए भी अपने लक्ष्य को मत भूलो। तुम क्या हो, यह मुख से मत बोलो क्योंकि लोगों तक तुम्हारी सफलता बोलनी चाहिए।
किसी कार्य को करते समय सब कुछ मुझ पर ही निर्भर है, इस भाव से कर्म करो एवं कर्म करने के बाद सब कुछ प्रभु पर ही निर्भर है, इस भाव से शरणागत हो जाओ। परिणाम में जो प्राप्त हो उसे प्रेम से स्वीकार कर लो। करने में सावधान और होने में प्रसन्न, यही आनंदमय जीवन का रहस्य है।
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