आज का संदेश
यदि प्रेम के बदले प्रेम का प्रत्युत्तर न भी मिले, अपने को ठगे जाने और घाटे में रहने का अवसर आवे तो भी उसकी हानि केवल भौतिक हानि ही रहेगी। प्रेम की दिव्य अनुभूतियाँ अपने अन्तःकरण में जब उठती रहती है तो वहाँ पुष्प-वाटिका की तरह सौंदर्य और सुगन्ध का साम्राज्य छाया रहता है। उसका आनन्द तो अपने को मिलता ही है। आत्मा की सबसे प्रिय अनुभूति प्रेम है। उसका रसास्वादन होते रहने से आत्म तृप्ति, आत्म सन्तोष और आत्मोल्लास का जो हर घड़ी लाभ होता रहता है उसकी तुलना में यदि कुछ भौतिक हानि उठानी पड़े तो वह तुच्छ एवं नगण्य ही मानी जायगी।
प्रेम की एक-एक बूँद के लिए यह दुनिया तरस रही है। अनावृष्टि काल में पानी का जैसा अकाल रेगिस्तानों में पड़ता है वैसा ही प्रेम दुर्भिक्ष आज सर्वत्र छाया हुआ है। प्रेम के नाम पर ठगी, चापलूसी, वासना और शोषण की प्रवंचना तो खूब बढ़ी है पर सच्चा प्रेम-जिसमें आत्म-दान और निःस्वार्थ सेवा का ही समावेश होता है अब देखने को नहीं मिलता इस आध्यात्मिक विभूति के अभाव में जीवन नीरस ही बने रहते हैं। सब ओर कुछ खोया-खोया सा, सब ओर अभाव-अभाव सा ही दिखाई पड़ता है। यदि सच्चे प्रेम के कुछ कण भी किसी को प्राप्त हो जाते हैं तो सचमुच ही उसके सब अभाव पूर्ण हो जाते हैं।
अपने भीतर सच्चे प्रेम की भावनाएँ जागृत करनी चाहिए, दूसरों को अपना मानना चाहिए, उन्हें आत्मीयता की दृष्टि से देखना चाहिए, फलस्वरूप हम भी सच्चे प्रेम के रसास्वादन से वंचित न रहेंगे। संसार के खेत में अपना प्रेम बीज बखेरते फिरें तो कोई-कोई पौधा उसका जरूर उगेगा और उसकी सुगंध से भी हमें आनंद और तृप्ति देने लायक बहुत कुछ मिल जायगा।
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