*गोपथ -ब्राह्मण एक प्राचीन,वैदिक ग्रन्थ है।*
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*मंगलनाथ उज्जैन से-*
*गोपथ- ब्राह्मण में बताया गया है कि वास्तव में सूर्य न कभी उदित होता है ,ना हि कभी अस्त होता है।*
*स व एष आदित्य न कदचनास्तमेति नोदेति*
*यदस्तमेति इति मन्यन्ते अह्न एवतदन्तमित्वा ।*
*अथात्मानं विपर्यस्यते यदेनं प्रतरुदेतीति मन्यन्ते रात्रि रेवान्तमित्वाऽथ तमानं विपर्यस्यते न वा एष कदाचन निम्रोचति।।*
*(गोपथ० 4/41)*
*स वा एष आदित्य न कदाचनास्तमेती-यह सूर्य कभी भी अस्त नही होता, नोदेती - न ही कभी उदित होता है । तं यदस्तमेति इति मन्यते अन्ह एव , जो लोग सूर्य को अस्त मानते हैं वो ठीक नहि है ,क्यों कि अन्यत्र अह्न एव - कहीं पर दिन हो जाता है यदि सूर्य डूबता या अस्त होता तो वहाँ दिन नहीं रहना चाहिये ? इसलिये तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते सूर्य डूब जाता है ऐसा समझ ने वाले स्वयं को ही अज्ञान रूप अन्धकार मे डुबो लेते हैं ।*
*यदेनं प्रातरुदेतीतिमन्यते -*
*इसी प्रकार जो लोग डुबा हुआ सूर्य प्रात: काल में फिर से निकलता है ऐसा समझ ते हैं , रात्रिरेव -वो भी ठीक नही है क्यों कि इसी पृथ्वी में तो कहीं इस काल में भी रात्री ही तो है । अत: रात्रि का अन्त हुआ ऐसा समझने वाले लोग- तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते - रात्रि का अ न्त हुआ ऐसा समझकर स्वयं को ही मूर्ख बना लेते हैं ।*
*न वा एष कदाचन निम्रोचति -*
*सूर्य न कभी पूर्व में,उदित होता है*
*नाही कभी पश्चिम में अस्त होता है ।*
*|| ॐ आदित्याय नमः ||*

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