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Saturday, July 13, 2024

श्रीजगन्नाथ जी की आँखे बड़ी क्यों है...?

 श्रीजगन्नाथ जी की आँखे बड़ी क्यों है...?




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इसके मूल में भगवान् के प्रगाढ़ प्रेम को प्रकट करने वाली एक अद्भुत गाथा है।


एक बार द्वारिका में रुक्मणी आदि रानियों ने माता रोहिणी से प्रार्थना की कि वे श्रीकृष्ण व गोपियों की बचपन वाली प्रेम लीलाएँ सुनना चाहतीं हैं।


पहले तो माता रोहिणी ने अपने पुत्र की अंतरंग लीलाओं को सुनाने से मना कर दिया।


किन्तु रानियों के बार-बार आग्रह करने पर मैया मान गईं और उन्होंने सुभद्रा जी को महल के बाहर पहरे पर खड़ा कर दिया और महल का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया ताकि कोई अनधिकारी जन विशुद्ध प्रेम के उन परम गोपनीय प्रसंगों को सुन न सके।


बहुत देर तक भीतर कथा प्रसंग चलते रहे और सुभद्रा जी बाहर पहरे पर सतर्क होकर खड़ी रहीं।


इतने में द्वारिका के राज दरबार का कार्य निपटाकर श्रीकृष्ण और बलराम जी वहाँ आ पहुँचे।


उन्होंने महल के भीतर जाना चाहा लेकिन सुभद्रा जी ने माता रोहिणी की आज्ञा बताकर उनको भीतर प्रवेश न करने दिया।


वे दोनों भी सुभद्रा जी के पास बाहर ही बैठ गए और महल के द्वार खुलने की प्रतीक्षा करने लगे।


उत्सुकता वश श्रीकृष्ण भीतर चल रही वार्ता के प्रसंगों को कान लगाकर सुनने लगे।



माता रोहिणी ने जब द्वारिका की रानियों को गोपियों के निष्काम प्रेम के भावपूर्ण प्रसंग सुनाए, तो उन्हें सुनकर श्रीकृष्ण अत्यंत रोमांचित हो उठे।


उन्हें स्मरण हो आया कि किस-किस प्रकार गोपियाँ अपनी प्रिया व प्रियतम (राधा-कृष्ण) को थोड़ा-सा सुख देने के लिए ही अपने बड़े से बड़े सुख का त्याग कर देतीं थीं। 


कैसे-कैसे गोपियों ने मेरे प्रेम के लिए न लोकलाज की तनिक भी परवाह की और न वेद-शास्त्र का डर रखते हुए नरकादि की ही कोई चिंता की।


गोपियों के परम प्रेम के दिव्य भावों की वार्ता सुन-सुनकर श्रीकृष्ण भावावेश में संकुचित होने लगे।


मधुर भाव की सब लीलाएँ मानो साकार होकर उनके समक्ष घूमने लगीं थीं।


गोपियों के परम त्याग की बातें सुन-सुनकर उनकी आँखें आश्चर्य युक्त मधुर भाव के आवेश में फैलतीं ही चलीं गयीं।


और अंततः श्रीकृष्ण महाभाव की परम उच्चावस्था में प्रवेश कर गए।


उनका सारा शरीर सिकुड़ चुका था, शरीर के शेष अंग शिथिल होकर छोटे पड़ गए परंतु उनका चेहरा दमकता ही जा रहा था, आँखें लगातार फैलती ही चलीं गयीं।


श्री दाऊ जी ने जब श्रीकृष्ण की अपूर्वदृष्ट उस दशा को देखा, तो बाल सखाओं की स्मृतियों में भगवान् का इतना प्रगाढ़ लगाव देखकर वे भी परमानंद दशा से महाभाव में प्रवेश कर गए।


उनका भी चिंतन भगवान् से एकाकार हो जाने से उनकी शारीरिक दशा भी श्रीकृष्ण जैसी ही हो गयी।


अपने ही चिंतन में खोई सुभद्रा जी ने जब अनायास ही अपने दोनों भाइयों को परम प्रेम की अवर्णनीय अवस्था में देखा तो उनके भक्त वत्सल व प्रेमानुरक्ति के भाव का चिंतन करके सुभद्रा जी भी तल्लीन होने लगीं और देखते ही देखते वे भी तदारूप हो गईं।


उनकी भी शारीरिक दशा दोनों भाइयों जैसी ही हो गयी।

भगवान् की अंतः प्रेरणा से तभी वहाँ पर श्री नारद जी आ पहुँचे।


महल के भीतर और बाहर की सारी परिस्थिति को भली प्रकार देख-समझकर नारद जी श्रीकृष्ण के प्रेम में गदगद् होकर अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान् की स्तुति करने लगे।


श्री नारद जी ने जब देखा कि गोपियों के विशुद्ध निष्काम प्रेम के चिंतन मात्र से श्रीकृष्ण, बलराम व सुभद्रा की अपूर्व, अवर्णनीय महाभाव दशा हो गयी है,


 तो वे भी भगवान् के प्रेम में पागल से हो उठे।

भाँति-भाँति की स्तुति करते हुए बड़े प्रयत्नों से नारद जी ने भगवान् को अपने सामान्य स्वरूप में लाने का यत्न किया और भगवान् को सहज हुआ जानकर भक्त वत्सल नारद जी अपने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान् से प्रार्थना करने लगे-


"हे श्रीकृष्ण! मैंने परम आनंदमग्न हुए, महाभाव में निमग्न हुए, विस्फरित नेत्रों वाले आपके जिस अति विशेष विग्रह के दर्शन किए हैं, आपका वह रूप विश्व इतिहास में बड़े से बड़े पुण्यात्माओं व आपके भक्तों ने भी कभी नहीं देखा होगा।


अब आप कोई ऐसी कृपा कीजिए जिससे कि आने वाले इस कलियुग में जो पापात्मा जीव होंगे, 


वे आपके परम प्रेम में रूपांतरित हुए इसी श्री विग्रह के दर्शन कर पाएँ और परम प्रेम स्वरूपा गोपियों में आपके प्रति और आपमें गोपियों के प्रति कैसा अनन्य भक्ति का विशुद्ध भाव था, 


इसका सब लोग चिंतन करते हुए निष्काम भक्ति के पथ पर आगे बढ़ते हुए अपना कल्याण कर सकें तथा आपका दिव्य प्रेम पाने के पात्र बन सकें।


भगवान् ने नारद जी के जीव कल्याण हित दया भाव की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें वरदान देते हुए कहा, 


"नारद जी! कलियुग में मुझे भगवान् जगन्नाथ के रूप में जाना जाएगा और मेरे विशेष कृपापात्र भक्त उत्कल क्षेत्र के पुरी धाम में हम तीनों के इसी महाभाव रूप के विग्रह स्थापित करेंगे।


 कलियुग में मैं अपनी परम प्रेम की महाभाव दशा में ही बलराम और सुभद्रा के साथ सदा जगन्नाथ पुरी में विराजूँगा।"


जय जगन्नाथ

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कहाँ राजा भोज और ....

 *|| कहाँ राजा भोज और ....||*



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  *मंगल नाथ उज्जैन से-*

*महाराज भोज के विषय में यह सर्वविदित है कि वे एक कुशल शासक होने के साथ ही महान विद्वान भी थे |इसमें उनसे लिखित ग्रन्थ ही प्रमाण हैं | धारा नगरी उनकी  राजधानी थी जिसे आज मध्यप्रदेश का धार जिला कहा जाता है |*


*ऐसे महाराज के नाम के साथ एक*

    *लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि—*


 *कहां राजा भोज और कहाँ गंगू तेली*

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*इस कहावत को फिल्मी गाने में भी पिरोया गया।यही नहीं, तंज कसने के लिए भी इस कहावत का प्रयोग किया गया।कहावत लोकप्रिय है | यह ऐसी है कि आम बोलचाल में कहीं न कहीं सभी के जुबान से निकल ही जाती है |लेकिन इस कहावत की कहानी की सत्यता क्या है ? इस पर प्रकाश डालेंगे |*


*मध्यप्रदेश के भोपाल से करीब ढ़ाई सौ किलोमीटर दूर धार जिला ही राजा भोज की धारानगर कहां  जाता है | 11 वीं सदी में ये शहर मालवा की राजधानी रह चुका है और जिस राजा भोज ने इस नगरी को बसाया उस राजा की प्रशंसा करते आज तक बड़े बड़े विद्वान् ही नहीं राजा महाराजा और सामान्य जन भी करते आ रहे हैं |*


*राजा भोज के प्रशंसकों की देश-विदेश में कमी नहीं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजा भोज शस्त्रों के ही नहीं बल्कि शास्त्रों के भी ज्ञाता थे।उन्होंने वास्तुशास्त्र, व्याकरण,आयुर्वेद, योग, साहित्य और धर्म पर कई ग्रंथ और टीकाएँ लिखे | जो विद्वज्जनों से तिरोहित नही है |*


*कहा जाता है कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को एक जमाने में “भोजपाल” कहा जाता था और बाद में इसका “ज” गायब होकर ही इसका नाम “भोपाल” पड़ गया | वीआईपी रोड से भोपाल शहर में प्रवेश  करते ही राजा भोज की एक विशाल मूर्ति के दर्शन होते हैं |*


*11 वीं सदी में अपने 40 साल के शासन काल में महाराज भोज ने कई मंदिरों और इमारतों का निर्माण करवाया उसी में से एक है भोजशाला | कहा जाता है कि राजा भोज सरस्वती के उपासक थे और उन्होंने भोज शाला में सरस्वती की एक प्रतिमा भी स्थापित कराई थी जो आज लंदन में मौजूद है |*


 *गंगू तेली नहीं अपितु गांगेय तैलंग*

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*राजा भोज ने भोजशाला तो बनाई ही मगर वो आज भी जन जन में जाने जाते हैं एक कहावत के रूप में- “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली“ | किन्तु इस कहावत में गंगू तेली नहीं अपितु “गांगेय तैलंग” हैं |  गंगू अर्थात् गांगेय कलचुरि नरेश और तेली अर्थात् चालुका नरेश तैलय  दोनों मिलकर भी राजा भोज को नहीं हरा पाए थे। ये दक्षिण के राजा थे | और इन्होंने धार नगरी पर आक्रमण किया था मगर मुंह की खानी पड़ी तो धार के लोगों ने ही हंसी उड़ाई कि “कहां राजा भोज कहां गांगेय तैलंग”|गांगेय तैलंग का ही  विकृत रूप है “गंगू तेली” | जो आज “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली“ रूप में प्रसिद्ध है |*


*धार शहर में पहाड़ी पर तेली की लाट रखी हैं। कहा जाता है कि राजा भोज पर हमला करने आए तेलंगाना के राजा इन लोहे की लाट को यहीं छोड़ गए और इसलिए इन्हें तेली की लाट कहा जाता है।*


*कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू  तेली” कहावत का यही असली रहस्य हैं | इसी पर चल पड़ी थी यह कहावत।*


*|| मालवा के राजा भोज की जय हो ||*



भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के *लायक समझता है

 🌷जय श्री कृष्ण🌷


उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुचा , पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई *चारा नही था* 


मैंने सोचा कही *नाश्ता* कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रहा था।


अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे *दो बच्चों* पर पड़ी, दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण *अस्थिपिंजर* साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे।


छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे *चुप कराने की कोशिश* कर रहा था, मैं अचानक रुक गया दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये।


जीवन को देख *मेरा मन भर* आया l


सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु दे कर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हु मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।


मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे ?


बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हु, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए।


उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डाट दिया और भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।

होटल वाले ने आश्चर्य🤔🤔 से मेरी ओर देखा..


उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी😊😊 *कुछ निराली* ही थी।


मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना।


और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।


वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द *आदर मे परिवर्तित* हो चुके थे।


मैं स्टेशन की ओर निकला, थोडा मन भारी लग रहा था मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था। 


रास्ते में *मंदिर* आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा *हे भगवान !* आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख, आप *कैसे चुप बैठ सकते है*।


दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया,

पुत्र अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो *कौन था?* 

क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब *अपनी सोच से किया*।

मैं स्तब्ध हो गया, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए 

ऐसा लगा जैसे *मैंने ईश्वर से बात की हो।*

मुझे समझ आ चुका था हम *निमित्त* मात्र है उसके कार्य कलाप के वो *महान* है।


भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के *लायक समझता है*


🌷जय श्री राधे राधे🌷

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Friday, July 12, 2024

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था ..! पांडव हिमालय को जा चुके थे ..


 महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था ..!

पांडव हिमालय को जा चुके थे ...!

और आर्यावर्त पे अभिमन्यु के पुत्र ..चक्रवर्ती सम्राट महाराज परीक्षित का शासन था ..!

वैसे तो चारो ओर शांति थी ..पर नागराज तक्षक ( यहां नागों का मतलब सांप से नही है ..बल्कि नाग मनुष्यों की ही एक जाति थी ...जो सनातन परंपरा में विश्वास नही रखते थे ..) के अनुयायी जब तब उपद्रव करते रहते थे .! 

हालांकि अर्जुन ने नाग कन्या उलूपी से विवाह किया था ...जिससे अर्जुन को एक पुत्र बभ्रुवाहन भी था ...

जो कि महाभारत के युद्ध में वीरता से लड़ा था ..!

फिर भी नाग अर्जुन के हाथों अपनी पराजय को भूले नही थे ..!

इसलिए परीक्षित से द्वेष रखते थे ..! और मौका मिलते ही कहीं न कहीं वार कर बैठते थे ..!

जिससे निपटने के लिए महाराज परीक्षित अक्सर कड़ी निंदा से काम चलाते थे ..!

जब ज्यादा ही हो जाता तो कहीं कहीं छिटपुट सैन्य करवाई भी होती रहती ..!

कालांतर में श्रृंगी ऋषि से कुछ विवाद में तक्षक षडयन्त्र पूर्वक महाराज परीक्षित की हत्या कर देता है !

उनके बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय सम्राट बनते हैं ..!

मंत्री मंडल की पहली ही मीटिंग में महाराज जनमेजय नाग यज्ञ का प्रस्ताव रखते हैं ..!

चारो ओर हाहाकार मच जाता है ..!.तक्षक से ले के इंद्रलोक तक सन्नाटा पसर जाता है ..!

चारो ओर दूत दौड़ने लगते हैं ...बड़े बड़े ऋषि मुनि कुरुकुल की मर्यादा का हवाला दे के जनमेजय से नाग यज्ञ स्थगित करने की प्रार्थना करते हैं ..!

सेकुलरों की पूरी फौज महाराज जनमेजय को सांप्रदायिक घोषित करती है ..!

पर महाराज नाग यज्ञ की तैयारी का आदेश जारी कर देते हैं ..!

नाग यज्ञ का कॉन्सेप्ट बहुत वीभत्स था ..!

मतलब नागों का समूल नाश .!

न कोई दोषी न कोई निर्दोष सबकी एक सजा ..!

गांव गांव जा के सैनिक एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदते थे !

उसमे लकड़ी डाल के भयानक आग जलाई जाती और नागों के बीबी बच्चे वृद्ध जो भी मिलते उन्हें जिंदा उसी आग में झोंक दिया जाता ..!

नागों का सफाया होने लगा ..! जब चंद नाग ही बचे फिर महर्षि वेद ब्यास ने जनमेजय से कहा ..!

राजन अब शांत होओ ..! नागों से तुम्हारी रिश्ते दारी भी है अतः अब ये संहार बंद करो..! और समाप्त हुआ कई पीढ़ियों से चली आ रही नागों की कुरुओं के प्रति कटुता ..!

अपराधियों का इलाज सिर्फ नाग यज्ञ है ..! यानी समूल नाश ।



Thursday, July 11, 2024

*ॐ नमो निखिलेश्वराय महाकाल्यै महाकालाय स्वाहा*

*ॐ नमो निखिलेश्वराय महाकाल्यै महाकालाय स्वाहा*


दस महाव‍िद्याएं कौन कौन सी हैं? 

 नाम, बीज मंत्र और उत्पत्ति।


शास्त्रों और पुराणों में दस महाविद्याओं का वर्णन मिलता है। तंत्र साधना में और तंत्र विद्या में इस दस महाविद्याओं का विशेष महत्व रहा है। 

महाविद्या का शाब्दिक अर्थ “महा” अर्थात महान्, विशाल, विराट ; तथा “विद्या” अर्थात ज्ञान है। यह दस महाविद्या की उपासना और साधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दस महाविद्याओ को दशावतार भी कहा जाता है। स्वयं माँ दुर्गा के ही दशावतार दस महाविद्या है।

परमपिता ब्रह्मा द्वारा रचित ब्रह्मांण्ड के मूल में और प्रकृति की समस्त शक्तियों में दस महाविद्यायें समाहित हैं। इन दस महाविद्या की साधना करके मनुष्य इस जीवन को तो सुधारता ही लेता है परन्तु परलोक को भी सुधार लेता है। 


दस के अंक का सनातन धर्म में अपना ही एक महत्व रहा है, जैसे की दिशाओं की कुल संख्या भी 10 है जो दस महाविद्याओ की प्रत्येक दिशा है।

दस महाविद्याओ विभिन्न दिशाओं की अधिष्ठात्री शक्तियां हैं। महाकाली और तारा देवी- उत्तर दिशा की, छिन्नमस्ता पूर्व दिशा की, षोडशी ईशान दिशा की, भुवनेश्वरी पश्चिम दिशा की, त्रिपुर भैरवी दक्षिण दिशा की, धूमावती पूर्व दिशा की, बगलामुखी दक्षिण दिशा की, मातंगी वायव्य दिशा की और माता कमला नैऋत्य दिशा की अधिष्ठात्री शक्ति है।


काली, तारा महाविद्या, षोडशी भुवनेश्वरी।

भैरवी, छिन्नमस्तिका च विद्या धूमावती तथा।।


बगला सिद्धविद्या च मातंगी कमलात्मिका।

एता दश-महाविद्याः सिद्ध-विद्याः प्रकीर्तिताः


दस महाविद्या :-

1) महाकाली

2) तारा (देवी)

3) छिन्नमस्ता

4) षोडशी

5) भुवनेश्वरी

6) भैरवी

7) धूमावती

8) बगलामुखी

9) मातंगी

10) कमला


1) महाकाली

माता दुर्गा के दस महाविद्या स्वरूपों में महाकाली का प्रथम स्वरुप माना जाता है। माता के इस स्वरूप की पूजा करने से सिद्धि प्राप्त होती है। माता काली ने देवताऔं और दानवों के युद्ध में देवताओ को विजय दिलवाई थी। गुजरात, कोलकाता और मध्यप्रदेश में महाकाली के जाग्रत मंदिर हैं।


बीज मंत्र: ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिका

क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥


2) तारा देवी

तारा देवी तांत्रिकों की मुख्य देवी है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में तारापीठ है, इसी स्थान पर तारा देवी की आराधना सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ऋषि ने की थी। आर्थिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सती के इस रूप की आराधना की जाती है।


बीज मंत्र: ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्॥


3) छिन्नमस्ता

छिन्नमस्ता का रूप कटा सिर और बहती रक्त की तीन धारा से अत्यंत शोभायमान् रहता है। छिन्नमस्ता महाविद्या का शांत स्वरूप का दर्शन करने के लिए शांत मन से उपासना की जाती है। उग्र रूप के दर्शन करने के लिए उग्र रूप में उपासना की जाती है। छिन्नमस्ता कामाख्या के बाद दूसरा लोकप्रिय शक्तिपीठ है।

झारखंड में रामगढ़ के नजदीक माता छिन्नमस्तिका का मंदिर है।


बीज मंत्र: श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा॥


4) षोडशी

महाविद्या षोडशी को ललिता, राज राजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बालापञ्चदशी आदि नाम से भी जाना जाता है। षोडशी माता 16 कलाओ से संपन्न है। त्रिपुरा स्थित जहा माता के वस्त्र गिरे थे वहा माँ का शक्तिपीठ है। षोडशी माहेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्रीविग्रहवाली सिद्ध देवी हैं। महाविद्याओं में इनका चौथा स्थान है। जो इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता है।


बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुंदरीयै नमः॥


5) भुवनेश्वरी

दश महाविद्याओ में भुवनेश्वरी पाँचवें स्थान पर उल्लेख हैं। देवीपुराण के अनुसार भुवनेश्वरी ही मूल प्रकृति का दूसरा नाम है। भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करना माता रानी भुवनेश्वरी का स्वाभाविक गुण है। भुवनेश्वरी माता की उपासना से पुत्र प्राप्ति के लिये विशेष फलप्रदा है । रुद्रयामल में इनका कवच, नीलसरस्वतीतन्त्र में इनका हृदय और महातन्त्रार्णव में इनका सहस्रनाम संकलित है।


बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः॥


6) भैरवी

महाविद्याओं में भैरवी का छठा स्थान प्राप्त है, और भैरवी का मुख्य उपयोग घोर कर्म में होता है। महाविद्या भैरवी का मत्स्यपुराण में त्रिपुरभैरवी, कोलेशभैरवी, रुद्रभैरवी, चैतन्यभैरवी तथा नित्यभैरवी आदि रूपों का वर्णन प्राप्त होता है।


बीज मंत्र: ॐ ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा॥


7) धूमावती

महाविद्याओ में धूमावती देवी सातवें स्थान पर परिगणित हैं। धूमावती की उपासना विपत्ति-नाश, रोग निवारण, युद्ध-जय, उच्चाटन तथा मारण आदि के लिये की जाती है। ग्रन्थों के अनुसार धूमावती देवी उग्रतारा ही हैं, जो धूम्रा होने से धूमावती कही जाती हैं। ऋग्वेद के रात्रिसूक्त में धूमावती को ‘सुतरा’ कहा गया है। सुतरा का अर्थ सुखपूर्वक तारनेयोग्य है।


बीज मंत्र: ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा॥


8) बगलामुखी

महाविद्याओं में देवी बगलामुखी आठवे स्थान पर है। बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की महादेवी भी कहा जाता है। बगलामुखी का स्वरुप पीतांबरा हे, पीत अर्थात पीला जैसे पीत आभूषणों से, वस्त्रों से और पीत पुष्पों से शृंगारित है। इन की उपासना में हरिद्रामाला, पीत- पुष्प एवं पीतवस्त्र का विधान है। बगलामुखी सुधासमुद्र के मध्य में स्थित मणिमय मण्डप में रत्नमय सिंहासन पर विराज रही हैं।


बीज मंत्र: ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नमः॥


9) मातंगी

महाविद्याओ में देवी मातंगी नौवीं महाविद्या है। दश महाविद्याओं में मातंगी की उपासना विशेष रूप से तंत्र-मंत्र योग के लिये की जाती है। देवी मातंगी की सिद्धि प्राप्त करता है वह मनुष्य खेल और कला के कौशल से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। मातंगी असुरों को मोहित करनेवाली और भक्तों को मनचाहा फल देनेवाली हैं। गृहस्थ- जीवन को सुखी बनाने, पुरुषार्थ सिद्धि और आनंद में पारंगत होने के लिये मातंगी की साधना सर्वोतम है ।


बीज मंत्र: ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा॥


10) कमला

महाविद्याओ में देवी कमला दसवीं और अंतिम महाविद्या हैं। कमला को महालक्ष्मी का ही स्वरुप माना गया है। माता कमला की उपासना धन सम्पति और समृद्धि के लिए की जाती है। माता कमला को लक्ष्मी, भार्गवी और षोडशी भी कहा जाता है। इनकी उपासना से समस्त सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। देवी कमला एक रूप में समस्त भौतिक या प्राकृतिक सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं और दूसरे रूप में सच्चिदानन्दमयी लक्ष्मी हैं; जो भगवान् विष्णु से अभिन्न हैं।


बीज मंत्र: ॐ ह्रीं अष्ट महालक्ष्म्यै नमः॥


यह हैं दस महाविद्याएं: 


काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला। 

इन देवियों को दस महाविद्या कहा जाता हैं। इनका संबंध भगवान विष्णु के दस अवतारों से हैं। 

मसलन भगवान श्रीराम को तारा का तो श्रीकृष्ण को काली का अवतार माना जाता है।

पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के दक्षिण द्वार के पास श्रीहनुमान जी की मूर्ति की कहानी अद्भुत है।

 पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के दक्षिण द्वार के पास श्रीहनुमान जी की मूर्ति की कहानी अद्भुत है।

कहा जाता है कि मंदिर के पास स्थित समुंदर की लहरें कभी भी मंदिर के प्रांगण में आ जाती थीं, जिससे वहां लगभग हर वक़्त स्थिति आपदा वाली रहती थी, जिससे वहां पर आए भक्तों को बहुत परेशानी होती थी।


एक बार वरुण भगवान का दर्शन करना चाहते थे इसलिए वह मंदिर गए और परिणामस्वरूप शहर में बाढ़ आ गई।


निवासी चाहते थे कि कोई ऐसा होना चाहिए जो समुद्र के पानी को मंदिरों के शहर में प्रवेश करने से रोक सके। अब कौन कर सकता था यह जघन्य कार्य। यह स्वाभाविक है कि भगवान जगन्नाथ हनुमान की ओर मुड़े, जो भगवान राम के समय में माता सीता को खोजने के लिए आसानी से समुद्र पार कर गए थे।


हनुमान खुशी से राजी हो गए। और सबने राहत महसूस की और खुश थे।

लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए हनुमान दुखी होने लगे।


क्योंकि भोजन के कारण जो उन्हें दिया गया था। कहा जाता है कि उस दौरान भगवान जगन्नाथ को भोग के रूप में सिर्फ खिचड़ी (चावल और दाल से बनी डिश) ही चढ़ाई जाती थी। और वही हनुमान को भी दिया गया था। वह तंग आ गए । उन्हें अयोध्या में स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेने का अनुभव था।


तो एक दिन वह अपने आप को रोक नहीं पाए और उन्होंने सोचा कि कुछ देर के लिए अयोध्या चला जाता हूं और जितना हो सके तरह-तरह के भोजन करने के बाद  फिर मैं जल्दी से वापस पुरी लौट आऊंगा।


अत: वह रात्रि में स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद लेने अयोध्या चले गए। लेकिन उनकी अनुपस्थिति में समुद्र शहर में प्रवेश कर गया। हर कोई सोच रहा था कि ऐसा कैसे हो गया?


जल्द ही उन्हें पता चला कि हनुमान थोड़े समय के लिए शहर में नहीं थे और उन्होंने बिना मंजूरी के छुट्टी ले ली थी।


भगवान जगन्नाथ ने आदेश दिया कि हनुमान को जंजीरों से बांध दिया जाए। हनुमान ने अपनी गलती स्वीकार की और खुशी-खुशी बंधने को तैयार हो गए। कहा जाता है कि हर कड़ी पर भगवान राम का नाम खुदा हुआ है।


इसलिए यहां हनुमान को वेदी हनुमान या बेदी हनुमान यानी जंजीरों से बंधे हनुमान भी कहा जाता है। उन्हें दरिया महावीर के नाम से भी जाना जाता है।


प्रसादम के बारे में क्या?


अपने मुकदमे की पैरवी करते हुए हनुमान ने भगवान जगन्नाथ को उस कारण के बारे में बताया कि उन्हें रात में अयोध्या भागना पड़ा था। भगवान जगन्नाथ ने समस्या को समझा और कहा जाता है कि उस दिन से यह निर्णय लिया गया कि भगवान जगन्नाथ को विभिन्न प्रकार के भोजन का भोग लगाया जाएगा और हनुमान को भी विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। हनुमान अब प्रसन्न हुए और उन्होंने वहीं रहने का फैसला किया।


उस दिन के बाद से कभी भी ज्वार की लहरों ने शहर में प्रवेश नहीं किया, निवासियों को कभी परेशान नहीं किया।



हनुमान श्री क्षेत्र के संरक्षक देवता बने।




पुरीनगरस्य विश्वप्रसिद्धश्रीजगन्नाथजीमन्दिरस्य दक्षिणद्वारस्य समीपं श्री हनुमानजीमूर्तेः कथा अद्भुता अस्ति।


 
 कथ्यते यत् मन्दिरस्य समीपे स्थिताः समुद्रस्य तरङ्गाः कदापि मन्दिरस्य प्राङ्गणे आगच्छन्ति स्म, यस्मात् कारणात् प्रायः सर्वदा एव स्थितिः आपदा इव आसीत्, येन तत्र आगच्छन्तः भक्ताः बहु कष्टं जनयन्ति स्म .

 एकदा वरुणः भगवन्तं द्रष्टुम् इच्छति स्म अतः सः मन्दिरं गतः फलतः नगरं प्लावितम् अभवत् ।

 मन्दिरनगरं समुद्रजलस्य प्रवेशं निवारयितुं किमपि भवतु इति निवासिनः इच्छन्ति स्म ।  इदानीं कः एतत् जघन्यं कार्यं कर्तुं शक्नोति स्म ?  भगवान् जगन्नाथः हनुमन्तस्य समीपं गतवान्, यः भगवतः रामकाले सहजतया समुद्रं लङ्घ्य सीतां मातरं अन्वेष्टुं कृतवान् आसीत् ।

 हनुमान् हर्षेण तदनुमोदितवान्।  सर्वे च निश्चिन्तः प्रसन्नाः च अभवन् ।
 परन्तु यथा यथा दिवसाः गच्छन्ति स्म तथा तथा हनुमानः दुःखं अनुभवितुं आरब्धवान् ।

 यस्मादन्नं तेभ्यः दत्तम् आसीत् ।  कथ्यते यत् तस्मिन् काले केवलं खिचडी (तण्डुलदालनिर्मितं व्यञ्जनं) भगवते जगन्नाथाय भोगरूपेण अर्पितं भवति स्म ।  हनुमते अपि तथैव दत्तम्।  सः क्लिष्टः अभवत्।  अयोध्यायां स्वादिष्टानि भोजनानि भोक्तुं तस्य अनुभवः अभवत् ।

 अतः एकस्मिन् दिने सः आत्मनः संयमं कर्तुं न शक्नोति स्म, किञ्चित्कालं यावत् अयोध्यां गमिष्यामि, यथाशक्ति विविधानि आहारपदार्थानि खादित्वा सः शीघ्रं पुनः पुरीनगरं प्रत्यागमिष्यति इति चिन्तयति स्म ।

 अतः सः स्वादिष्टानि व्यञ्जनानि आस्वादयितुं रात्रौ अयोध्यां गतवान् ।  तस्याभावे तु समुद्रः पुरं प्रविष्टवान्।  सर्वे चिन्तयन्ति स्म यत् एतत् कथं जातम्?

 शीघ्रमेव ते ज्ञातवन्तः यत् हनुमानः अल्पकालं यावत् नगरे नास्ति, अनुज्ञां विना अवकाशं च गृहीतवान् ।

 भगवान् जगन्नाथः हनुमान् शृङ्खलाभिः बद्धः इति आज्ञां दत्तवान् ।  हनुमतः स्वस्य त्रुटिं स्वीकृत्य ग्रन्थिं बद्धुं प्रसन्नः अभवत् ।  प्रत्येकं लिङ्के भगवतः रामस्य नाम उत्कीर्णं भवति इति कथ्यते ।

 अतः अत्र हनुमान् वेदी हनुमान् अथवा बेदी हनुमान् अर्थात् शृङ्खलाबद्ध हनुमान् इत्यपि उच्यते।  सः दरिया महावीर इति अपि प्रसिद्धः अस्ति ।


प्रसादं किम्?

 हनुमानः स्वप्रकरणस्य याचनां कुर्वन् जगन्नाथं भगवन्तं न्यवेदयत् यत् रात्रौ अयोध्यानगरं पलायितव्यम् इति कारणम् ।  भगवान् जगन्नाथः समस्यां अवगत्य तस्मात् दिवसात् एव निर्णयः अभवत् यत् भगवते जगन्नाथस्य कृते विविधाः प्रकाराः आहाराः अर्पिताः भविष्यन्ति तथा च विविधाः व्यञ्जनानि अपि हनुमानस्य कृते अर्पितानि भविष्यन्ति।  हनुमान् इदानीं प्रसन्नः सन् तत्र स्थातुं निश्चितवान् ।

 ततः परं ज्वारभाटाः कदापि नगरं न प्रविशन्ति स्म, कदापि निवासिनः न बाधन्ते स्म ।

 हनुमान् श्रीक्षेत्रस्य रक्षकदेवता अभवत्।

Tuesday, July 9, 2024

महाप्रभु वल्लभाचार्य पुण्य दिवस विशेष

 महाप्रभु वल्लभाचार्य पुण्य दिवस विशेष 

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पूरा नाम वल्लभाचार्य

जन्म संवत 👉 1530

मृत्यु संवत 👉 1588

संतान दो पुत्र👉 गोपीनाथ व विट्ठलनाथ

कर्म भूमि 👉  ब्रज


प्रसिद्धि पुष्टिमार्ग के प्रणेता

विशेष योगदान शुद्धाद्वैत के संदर्भ में वल्लभाचार्य द्वारा भागवत पर रचित सुबोधिनी टीका का महत्त्व बहुत अधिक है।


नागरिकता 👉 भारतीय

संबंधित लेख 👉 अद्वैतवाद, वल्लभ सम्प्रदाय, ब्रह्मसूत्र


वल्लभाचार्य ने दार्शनिक समस्याओं के समाधान में अनुमान को अनुपयुक्त मानकर शब्द प्रमाण को वरीयता दी है।


भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधार स्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता माने जाते हैं। जिनका प्रादुर्भाव ईः सन् 1479, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्री लक्ष्मणभट्ट जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें 'वैश्वानरावतार अग्नि का अवतार' कहा गया है। वे वेद शास्त्र में पारंगत थे। श्री रुद्रसंप्रदाय के श्री विल्वमंगलाचार्य जी द्वारा इन्हें 'अष्टादशाक्षर गोपाल मन्त्र' की दीक्षा दी गई। त्रिदंड सन्न्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्र तीर्थ से प्राप्त हुई। विवाह पंडित श्रीदेव भट्ट जी की कन्या महालक्ष्मी से हुआ, और यथासमय दो पुत्र हुए- श्री गोपीनाथ व विट्ठलनाथ।


जीवन परिचय

〰️〰️〰️〰️〰️श्री वल्लभाचार्य जी विष्णुस्वामी संप्रदाय की परंपरा में एक स्वतंत्र भक्ति-पंथ के प्रतिष्ठाता, शुद्धाद्वैत दार्शनिक सिद्धांत के समर्थक प्रचारक और भगवत-अनुग्रह प्रधान एवं भक्ति-सेवा समन्वित 'पुष्टि मार्ग' के प्रवर्त्तक थे। वे जिस काल में उत्पन्न हुए थे, वह राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक सभी दृष्टियों से बड़े संकट का था


पूर्वज और माता-पिता

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️श्री वल्लभाचार्य जी के पूर्वज आंध्र राज्य में गोदावरी तटवर्ती कांकरवाड़ नामक स्थान के निवासी थे। वे भारद्धाज गोत्रीय तैलंग ब्राह्मण थे उनके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट दीक्षित प्रकांड विद्वान और धार्मिक महापुरुष थे। उनका विवाह विद्यानगर (विजयनगर) के राजपुरोहित सुशर्मा की गुणवती कन्या इल्लम्मगारू के साथ हुआ था; जिससे रामकृष्ण नामक पुत्र और सरस्वती एवं सुभद्रा नाम की दो कन्याओं की उत्पत्ति हुई थी।




श्री लक्ष्मण भट्ट अपने संगी-साथियों के साथ यात्रा के कष्टों को सहन करते हुए जब वर्तमान मध्य प्रदेश में रायपुर ज़िले के चंपारण्य नामक वन में होकर जा रहे थे, तब उनकी पत्नी को अकस्मात प्रसव-पीड़ा होने लगी। सांयकाल का समय था। सब लोग पास के चौड़ा नगर में रात्रि को विश्राम करना चाहते थे; किन्तु इल्लमा जी वहाँ तक पहुँचने में भी असमर्थ थीं। निदान लक्ष्मण भट्ट अपनी पत्नी सहित उस निर्जंन वन में रह गये और उनके साथी आगे बढ़ कर चौड़ा नगर में पहुँच गये। उसी रात्रि को इल्लम्मागारू ने उस निर्जन वन के एक विशाल शमी वृक्ष के नीचे अठमासे शिशु को जन्म दिया। बालक पैदा होते ही निष्चेष्ट और संज्ञाहीन सा ज्ञात हुआ, इसलिए इल्लम्मागारू ने अपने पति को सूचित किया कि मृत बालक उत्पन्न हुआ है। रात्रि के अंधकार में लक्ष्मण भट्ट भी शिशु की ठीक तरह से परीक्षा नहीं कर सके। उन्होंने दैवेच्छा पर संतोष मानते हुए बालक को वस्त्र में लपेट कर शमी वृक्ष के नीचे एक गड़ढे में रख दिया और उसे सूखे पत्तों से ढक दिया। तदुपरांत उसे वहीं छोड़ कर आप अपनी पत्नी सहित चौड़ा नगर में जाकर रात्रि में विश्राम करने लगे।


दूसरे दिन प्रात:काल आगत यात्रियों ने बतलाया कि काशी पर यवनों की चढ़ाई का संकट दूर हो गया। उस समाचार को सुन कर उनके कुछ साथी काशी वापिस जाने का विचार करने लगे और शेष दक्षिण की ओर जाने लगे। लक्ष्मण भट्ट काशी जाने वाले दल के साथ हो लिये। जब वे गत रात्रि के स्थान पर पहुंचे, तो वहाँ पर उन्होंने अपने पुत्र को जीवित अवस्था में पाया। ऐसा कहा जाता है उस गड़ढे के चहुँ ओर प्रज्जवलित अग्नि का एक मंडल सा बना हुआ था और उसके बीच में वह नवजात बालक खेल रहा था। उस अद्भुत दृश्य को देख कर दम्पति को बड़ा आश्चर्य और हर्ष हुआ। इल्लम्मा जी ने तत्काल शिशु को अपनी गोद में उठा लिया और स्नेह से स्तनपान कराया। उसी निर्जन वन में बालक के जातकर्म और नामकरण के संस्कार किये गये। बालक का नाम 'वल्लभ' रखा गया, जो बड़ा होने पर सुप्रसिद्ध महाप्रभु वल्लभाचार्य हुआ। उन्हें अग्निकुण्ड से उत्पन्न और भगवान की मुखाग्नि स्वरूप 'वैश्वानर का अवतार' माना जाता है।


आरंभिक जीवन

〰️〰️〰️〰️〰️〰️वल्लभाचार्य जी का आरंभिक जीवन काशी में व्यतीत हुआ था, जहाँ उनकी शिक्षा-दीक्षा तथा उनके अध्ययनादि की समुचित व्यवस्था की गई थी। उनके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट ने उन्हें गोपाल मन्त्र की दीक्षा दी थी और श्री माधवेन्द्र पुरी के अतिरिक्त सर्वश्री विष्णुचित तिरूमल और गुरुनारायण दीक्षित के नाम भी मिलते हैं। वे आरंभ से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और अद्भुत प्रतिभाशाली थे। उन्होंने छोटी आयु में ही वेद, वेदांग, दर्शन, पुराण, काव्यादि में तथा विविध धार्मिक ग्रंथों में अभूतपूर्व निपुणता प्राप्त की थी। वे वैष्णव धर्म के अतिरिक्त जैन, बौद्ध, शैव, शाक्त, शांकर आदि धर्म-संप्रदायों के अद्वितीय विद्वान थे। उन्होंने अपने ज्ञान और पांडित्य के कारण काशी के विद्वत समाज में आदरणीय स्थान प्राप्त किया था।


कुटुम्ब-परिवार

〰️〰️〰️〰️〰️उनका कुटुम्ब परिवार काफ़ी बड़ा और समृद्ध था, जिसके अधिकांश व्यक्ति दक्षिण के आंध्र प्रदेश में निवास करते थे। उनकी दो बहिनें और तीन भाई थे। बड़े भाई का नाम रामकृष्ण भट्ट था। वे माधवेन्द्र पुरी के शिष्य और दक्षिण के किसी मठ के अधिपति थे। उन्होंने तपस्या द्वारा बड़ी सिद्धि प्राप्त की थी। संवत 1568 में वे वल्लभाचार्य जी के साथ बदरीनाथ धाम की यात्रा को गये थे। अपने उत्तर जीवन में वे संन्यासी हो गये थे। उनकी सन्न्यासावस्था का नाम केशवपुरी था। वल्लभाचार्य जी के छोटे भाई रामचन्द्र और विश्वनाथ थे। रामचंद्र भट्ट बड़े विद्वान और अनेक शास्त्रों के ज्ञाता थे। उनके एक पितृव्य ने उन्हें गोद ले लिया था और वे अपने पालक पिता के साथ अयोध्या में निवास करते थे। उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की थी, जिनमें 'श्रृंगार रोमावली शतक' (रचना-काल संवत 1574), 'कृपा-कुतूहल', 'गोपाल लीला' महाकाव्य और 'श्रृंगार वेदान्त' के नाम मिलते हैं।


वल्लभाचार्य जी का अध्ययन सं. 1545 में समाप्त हो गया था। तब उनके माता-पिता उन्हें लेकर तीर्थ यात्रा को चले गये थे। वे काशी से चल कर विविध तीर्थों की यात्रा करते हुए जगदीश पुरी गये और वहाँ से दक्षिण चले गये। दक्षिण के श्री वेंकटेश्वर बाला जी में संवत 1546 की चैत्र कृष्ण 9 को उनका देहावसान हुआ था। उस समय वल्लभाचार्य जी की आयु केवल 11-12 वर्ष की थी, किन्तु तब तक वे प्रकांड विद्वान और अद्वितीय धर्म-वेत्ता के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। उन्होंने काशी और जगदीश पुरी में अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ कर विजय प्राप्त की थी। वल्लभाचार्य जी के दो पुत्र हुए थे। बड़े पुत्र गोपीनाथ जी का जन्म संवत 1568 की आश्विन कृष्ण द्वादशी को अड़ैल में और छोटे पुत्र विट्ठलनाथ जी का जन्म संवत 1572 की पौष कृष्ण 9 को चरणाट में हुआ था। दोनों पुत्र अपने पिता के समान विद्वान और धर्मनिष्ठ थे।


मुख्य लेख : अद्वैतवाद

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अद्वैत वेदान्त की प्रतिक्रियास्वरूप ही वेदान्त के अन्य सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ। रामानुज, निम्बार्क, मध्व और वल्लभ ने ज्ञान के स्थान पर भक्ति को अधिक प्रश्रय देकर वेदान्त को जनसामान्य की पहुँच के योग्य बनाने का प्रयास किया। उपनिषद, गीता और ब्रह्मसूत्र के विश्लेषण पर ही शंकर के अद्वैतवाद का भवन खड़ा हुआ था। इसी कारण अन्य आचार्यों ने भी प्रस्थानत्रयी के साथ साथ भागवत को भी अपने मत का आधार बनाया। यद्यपि वल्लभाचार्य ने वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र तथा श्रीमद्भागवत की व्याख्याओं के माध्यम से अपने मत का उपस्थान किया, किन्तु उनका यह भी विचार रहा है कि उपर्युक्त स्रोत ग्रन्थों में से उत्तरोत्तर का प्रामाण्य अधिक है। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि शुद्धाद्वैत के संदर्भ में वल्लभाचार्य द्वारा भागवत पर रचित सुबोधिनी टीका का महत्त्व बहुत अधिक है। दर्शन में भक्ति का पुट श्रीमद्भागवत से अधिक शायद ही किसी अन्य ग्रन्थ में उपलब्ध होता हो। अत: वल्लभाचार्य के लिए यह स्वाभाविक ही था कि वह श्रीमद्भागवत को अधिक महत्त्व देते।


वल्लभाचार्य के प्रमुख ग्रंथ

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ब्रह्मसूत्र का 'अणु भाष्य' और वृहद भाष्य'

भागवत की 'सुबोधिनी' टीका

भागवत तत्वदीप निबंध

पूर्व मीमांसा भाष्य

गायत्री भाष्य

पत्रावलंवन

पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम

दशमस्कंध अनुक्रमणिका

त्रिविध नामावली

शिक्षा श्लोक

11 से 26 षोडस ग्रंथ, 


(1.यमुनाष्टक,2.बाल बोध,3.सिद्धांत मुक्तावली,4.पुष्टि प्रवाह मर्यादा भेद, 5.सिद्धान्त 6.नवरत्न, 7.अंत:करण प्रबोध, 8. विवेकधैयश्रिय, 9.कृष्णाश्रय, 10.चतुश्लोकी, 11.भक्तिवर्धिनी, 12.जलभेद, 13.पंचपद्य, 14.संन्सास निर्णय, 15.निरोध लक्षण 16.सेवाफल)

भगवत्पीठिका

न्यायादेश

सेवा फल विवरण

प्रेमामृत तथा

विविध अष्टक (1.मधुराष्टक, 2.परिवृढ़ाष्टक, 3. नंदकुमार अष्टक, 4.श्री कृष्णाष्टक, 5. गोपीजनबल्लभाष्टक आदि।)


अणुभाष्य

〰️〰️〰️ब्रह्मसूत्र पर वल्लभाचार्य ने अणुभाष्य लिखा। अणु शब्द का प्रयोग आचार्य ने क्यों किया। ऐसी मान्यता है कि वल्लभाचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर दो भाष्य लिखे थे, एक बृहदभाष्य (या भाष्य) और दूसरा अणु (छोटा) भाष्य। ऐसा प्रतीत होता है कि बृहदभाष्य अब उपलब्ध नहीं होता, किन्तु अणुभाष्य उसी का लघु संस्करण है। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि श्रीमद्भागवत पर भी वल्लभाचार्य ने एक बृहद टीका (सुबोधिनी) लिखी और एक लघु टीका (सूक्ष्म टीका, जो कि अब उपलब्ध नहीं होती)। एक ही ग्रन्थ की टीकाओं के एकाधिक संस्करण अन्य आचार्यों ने भी लिखे हैं। उदाहरणतया मध्वाचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर ही चार टीकाएं लिखी थीं-


भाष्य

〰️〰️अणुभाष्य (अथवा अनुव्याख्यान)

अनुव्याख्यान विवरण

अणुव्याख्यान।

ये चारों ही संस्करण उपलब्ध हैं। अत: मध्वाचार्य का अनुकरण करके वल्लभाचार्य ने भी ब्रह्मसूत्र के भाष्य के दो संस्करण (एक बढ़ा और एक सूक्ष्म) लिखे हों तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। वल्लभाचार्य ने दार्शनिक समस्याओं के समाधान में अनुमान को अनुपयुक्त मानकर शब्द प्रमाण को वरीयता दी है। उनके मतानुसार ब्रह्म माया से अलिपत होने के कारण नितान्त शुद्ध है। वह सत्, चित्, आनन्द रस से युक्त है। ब्रह्म अपनी संधिनी शक्ति के सत् का, संचित् शक्ति द्वारा चित् का, और ह्लादिनी शक्ति द्वारा आनन्द का आवर्भाव करता है। वह पूर्ण पुरुषोत्तम शाश्वत तथा सर्वव्यापक होने के साथ साथ कर्ता और भोक्ता दोनों है। जगत् को वह अपने में से आविर्भूत करता है। और इस प्रकार वह जगत् का निमित्तकरण तथा उपादान कारण भी है। वह अविकृत परिणामवाद के अनुसार अपने को जगत् के रूप में आविर्भूत करता है, अत: उसके मूल स्वरूप में कोई परिवर्तन या विकार नहीं आता है।[3]


ब्रह्म के तीन रूप

〰️〰️〰️〰️〰️〰️सृष्टि क्रम के संदर्भ में वल्लभाचार्य ने ब्रह्म के तीन रूप बताए हैं-


आधिभौतिक-पर ब्रह्म

आध्यात्मिक-अक्षर ब्रह्म

आधिभौतिक-जगत् ब्रह्म।

ब्रह्म रमण करने की इच्छा से जीव और जड़ का आविर्भाव करता है। इस व्यापार में उसकी क्रीड़ा करने की इच्छा का ही प्राधान्य है, न कि माया का। जिस प्रकार एक ही सर्प कुण्डल आदि बनाकर अनेक रूपों में दिखाई पड़ता है, किन्तु सर्प और उसके कुण्डलादि रूप अभिन्न हैं, उसी प्रकार ब्रह्म अनेक रूपों में स्फुरित होते हुए भी शुद्ध अद्वैत रूप ही है।


ब्रह्म का दूसरा रूप अक्षर ब्रह्म है। वह भी सत्, चित् तथा आनन्दमय है, किन्तु परब्रह्म में आनन्द असीमित मात्रा में है, जबकि अक्षर ब्रह्म में वह सीमित होता है। यह अक्षर ब्रह्म ही अवतार के रूप में आविर्भूत होता है। अक्षर ब्रह्म एक प्रकार से आधिवैदिक परब्रह्म का आध्यात्मिक (कायिक) रूप है। कहीं कहीं अक्षर ब्रह्म को परब्रह्म का पुच्छ भी कहा गया है। अक्षर ब्रह्म के अतिरिक्त काल, कर्म और स्वभाव भी परब्रह्म के ही रूपान्तर हैं। सृष्टि के आरम्भ में, अक्षर ब्रह्म प्रकृति और पुरुष के रूप में आविर्भूत होता है। प्रकृति ही विभिन्न सोपानों में परिणत होती हुई जगत् का सृजन करती है। इसलिए प्रकृति को कारणों का कारण कहा जाता है। काल, कर्म और स्वभाव इस सृष्टि प्रक्रिया में अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं। यद्यपि अक्षर, काल, कर्म और स्वभाव सृष्टि से पूर्व विद्यमान रहते हैं, किन्तु इनकी गिनती उन 28 तत्वों में नहीं की जाती, जिनका उल्लेख तत्वार्थदीप में इस प्रकार किया गया है- सत्व, रजस्, पुरुष, प्रकृति, महत्, अहंकार, पंचतन्मात्र, पंचमहाभूत, पंचकर्मेन्द्रियां, पंचज्ञानेन्द्रियां तथा मनस्। यह ज्ञातव्य है कि नाम साम्य होने पर भी तत्वार्थदीप में गिनाए गए तत्व सांख्य के तत्वों से भिन्न हैं।


जीव ब्रह्म

〰️〰️〰️वल्लभाचार्य के अनुसार जीव ब्रह्म ही है। यह भगवत्स्वरूप ही है, किन्तु उनका आनन्दांश-आवृत रहता है। जीव ब्रह्म से अभिन्न है, जब परब्रह्म की यह इच्छा हुई कि वह एक से अनेक हो जाये तो अक्षर ब्रह्म हज़ारों की संख्या में लाखों जीव उसी तरह से उद्भूत हुए, जैसे कि आग में से हज़ारों स्फुलिंग निकलते हैं। कुछ विशेष जीव अक्षर ब्रह्म की अपेक्षा सीधे ही परब्रह्म से आविर्भूत होते हैं। जीव का व्युच्चरण होता है उत्पत्ति नहीं। जीव इस प्रकार ब्रह्म का अंश है और नित्य है। लीला के लिए जीव में से आनन्द का अंश निकल जाता है, जिससे की जीव बंधन और अज्ञान में पड़ जाता है। जीव का जन्म और विनाश नहीं होता, शरीर की उत्पत्ति और नाश होता है। शंकर जीवात्मा को ज्ञानस्वरूप मानते हैं। वल्लभाचार्य के अनुसार वह ज्ञाता है। जीव अणु है किन्तु वह सर्वव्यापक और सर्वज्ञ नहीं है, चैतन्य के कारण वह भोग करता है। लीला के उद्देश्य से जगत् में वैविध्य लाने के लिए जीवों की तीन कोटियां बताई गई हैं-


शुद्ध, जिस जीव में आनन्दांश का तिरोभाव रहता है, पर अविद्या से जिसका सम्बन्ध नहीं रहता, वह शुद्ध कहलाता है।


संचारी, जब जीव का अविद्या से सम्बन्ध हो जाता है और वह जन्मादि क्रियाओं के बन्धन का विषय हो जाता है तो वह संचारी कहलाता है, संचारी जीव भी देव और आसुरभेद दो प्रकार के होते हैं।

मुक्त, जो जीव ईश्वर के अनुग्रह से सच्चिदानंद रूप का प्राप्त करते हैं और ईश्वरमय हो जाते हैं, वे मुक्त कहलाते हैं।

पति रूप या स्वामी रूप में श्रीकृष्ण की सेवा करना जीव का धर्म है। जीवों का जीवत्व, ईश्वर की आविर्भाव एवं तिरोभाव क्रियाओं का परिणाम है। इन क्रियाओं के द्वारा ही ईश्वर की कुछ शक्तियां एवं गुण जीव में तिरोभूत और कुछ आविर्भूत हो जाते हैं। वल्लभाचार्य के मतानुसार जगत् नित्य है। वह ब्रह्म का आधिभौतिक रूप है। उसमें सत् तो विद्यमान है, किन्तु चित् और आनंद प्रच्छन्न या अदृश्य रहते हैं। जगत् ब्रह्म की आविर्भाव दशा है। अत: कारणरूप ब्रह्म और कार्य रूप जगत् में कोई भेद नहीं है। वल्लभाचार्य के अनुसार जगत् ब्रह्मरूप ही है। कार्यरूप जगत् कारणरूप ब्रह्म से आविर्भूत हुआ है। सृष्टि ब्रह्म की आत्मकृति है। ब्रह्म से जगत् आविर्भूत हुआ, फिर भी ब्रह्म में कोई विकृति नहीं आती। यही अविकृत परिणामवाद है। जगत् की न तो उत्पत्ति होती है और न ही विनाश। उसका आविर्भाव-तिरोभाव होता है।


आविर्भाव का आशय

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️आविर्भाव का आशय है- अनुभव का विषय बनाना और तिरोभाव का अर्थ है- अनुभव का विषय न बनना।


उपादानस्य कार्य या व्यवहारणोचरं करोति, साशक्तिराविर्भांविका, तिरोभावश्च तदयोग्यत्वम्[4]


वल्लभाचार्य के मतानुसार जगत् और संसार

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️वल्लभाचार्य के मतानुसार जगत् और संसार में अंतर है। जगत् उसे कहते हैं, जो ईश्वर की इच्छा व विलास से आविर्भूत हो। इसके विपरीत, जीव अविद्या के प्रभाव से कल्पना तथा ममता द्वारा अर्थात् अविद्या के स्वरूपज्ञान, देहध्यास, इन्द्रियाध्यास, प्राणाध्यास तथा अंत:करणाध्यास- इन 'पर्वी' द्वारा जीवों की बुद्धि में जो द्वैतमूलक भ्रम उत्पन्न होता है, उससे जिस पदार्थ वर्ग की सृष्टि करता है वह संसार कहलाता है। ज्ञान होने पर संसार का नाश हो जाता है, किन्तु जगत् ब्रह्मरूप होने के कारण नष्ट नहीं होता। शुद्धाद्वैतवाद के अनुसार जगत् ब्रह्म और जीव के समान नित्य है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो विश्व दो प्रकार का होता है, एक पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि से बना हुआ जड़ जगत्, जिसमें चेतन जीव रहते हैं और दूसरा जीवों के ममत्व से उत्पन्न हुआ संसार। ब्रह्म जगत् का निमित्त कारण शरीर और उपादान कारण दोनों है। ब्रह्म को समवायिकारण भी कहा गया है, क्योंकि वह सत्, चित् और आनंद रूप में सर्वव्यापक है।


मोक्ष और माया

〰️〰️〰️〰️〰️अद्वैतवाद में माया को उपादान कारण माना गया है। वल्लभाचार्य ने माया के दो भेद बताये हैं- अविद्या माया और विद्या माया। अविद्या माया जीव में भ्रान्ति उत्पन्न करती है, जिससे कि वह अपने चित् रूप को भूल जाता है। विद्या माया अज्ञान नाशिनी होती है। मोक्ष प्राप्ति के संदर्भ में प्राय: तीन मार्गों का उल्लेख किया जाता है- कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग। वेदान्त के विभिन्न सम्प्रदायों में इनके सम्बन्ध में पर्याप्त मतभेद रहा है। शुद्ध द्वैतवाद के अनुसार अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास, पशुयाग, चातुर्मास्य और सोमयाग करने से मोक्ष प्राप्त होता है। किन्तु ऐसा मोक्ष देवयान मार्ग का अनुसरण करके ही प्राप्त होता है। जो व्यक्ति ज्ञान मार्ग का अनुसरण करता है यानी यह ज्ञान प्राप्त कर लेता है कि जगत् में जो कुछ है, वह सब ब्रह्म ही है, वह अक्षर ब्रह्म में विलीन होता है, न कि परब्रह्म में, क्योंकि ज्ञानमार्गी की सीमा अक्षर ब्रह्म तक ही है। ज्ञानमार्गी अक्षर ब्रह्म का ही अंतिम सत्ता समझता है। हाँ, यदि ब्रह्मज्ञान में भक्ति का सामंजस्य हो जाये तो व्यक्ति परब्रह्म में लीन हो सकता है। इससे भी उत्तम स्थिति वह है, जिसमें परब्रह्म अपनी ही इच्छा से किसी जीव का अपने अंदर से आविर्भाव करके उसके साथ स्वयं नित्यलीला करता है। यही भजनानंद या स्वरूपानंद की स्थिति है। शंकर ने मतानुसार जीव ब्रह्मक्य रूप मुक्ति का प्रतिपादन किया था, किन्तु वल्लभाचार्य के मतानुसार भगवद माहात्म्यज्ञानपूर्विका भक्ति ही मुक्ति का कारण है। यद्यपि भक्ति मुक्ति का साधन, परन्तु उसका महत्त्व मुक्ति से भी अधिक है। वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद को स्पष्ट रूप से समझने के लिए यह भी आवश्यक है कि वेदान्त के अन्य सम्प्रदायों और विशेष रूप से शंकर के सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में उसकी सरसरी समीक्षा कर ली जाये।


शुद्धाद्वैतवाद का तुलनात्मक विश्लेषण

वल्लभाचार्य का दार्शनिक सिद्धांत शुद्धाद्वैत नाम से प्रचलित हुआ। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद का प्रवर्तन करते हुए यह कहा था कि ब्रह्म और जीव में पारमार्थिक अमेद है। मध्वाचार्य ने शंकर के अद्वैतवाद के एकदम विपरीत द्वैतवाद की स्थापना की और यह प्रतिपादित किया कि ब्रह्म, जीव एवं जड़ जगत् में पारमार्थिक अमेद है। इन परस्पर विरोधी मतों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करते हुए रामानुजचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद का प्रवर्तन किया, जिसके अनुसार ब्रह्म, जीव एवं जगत् की पृथक् सत्ता तो है और तीनों नित्य भी हैं, किन्तु जीव और जगत् ब्रह्म के विशेषण हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शंकर के अनुसार जीव एकदम भिन्न सत्तायें हैं, जबकि रामानुज के अनुसार जीव की पृथक् सत्ता तो है, किन्तु वह ब्रह्म का एक प्रकार (विशेषण) है। उनमें अंशाशिभाव है। निम्बार्क के द्वैताद्वैतवाद के अनुसार ब्रह्म, जीव और जगत् में आश्रयाश्रयिभाव सम्बन्ध है। ईश्वर आश्रय है और जीव तथा जगत् की सत्ता आश्रय रूप ईश्वर के बिना संभव नहीं है। अत: ईश्वर, जीव और जगत् में भेद भी है और अभेद भी। वल्लभाचार्य के अनुसार जगत में ब्रह्म की आविर्भाव दशा है। जीव अणु है और ईश्वर का अंश है (अग्नि और स्फुलिंग के समान) जीव सर्वव्यापक है, किन्तु सर्वज्ञ नहीं है, फिर भी जीव और ब्रह्म में अभिन्नत्व है। जीव के समान जगत भी ईश्वर का ही रूप है। अत: वह भी ईश्वर से अभिन्न है। वल्लभ ने माया के सम्बन्ध में अलिप्त होने के कारण ब्रह्म को शुद्ध कहा है। अत: उनका सिद्धांत शुद्धाद्वैतवाद के रूप में प्रचलित हुआ है। शुद्धाद्वैत पर का विग्रह दो प्रकार से किया जा सकता है- (क) शुद्धं चेदम् अद्वैतं च (कर्मधारय) (ख) शुद्धयो: अद्वैतम् (षष्ठी तत्पुरुष)।


वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित शुद्धाद्वैत वेदान्त में ब्रह्म, जीव, जगत्, आदि का स्वरूप निम्नलिखित रूप से बतलाया गया है-


माया सम्बन्धरहितं शुद्धमित्युच्यते बुधे:।

कार्यकारणरूपं हि शुद्धं न मायिकम्।।[5]


शुद्धाद्वैतपदे ज्ञेय: कर्मधारय:।

श्रद्वैतं शुद्धयो: प्राहु: षष्ठीतत्पुरुषं बुधा:।


शंकराचार्य और वल्लभाचार्य

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️शंकराचार्य और वल्लभाचार्य दोनों ने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया है। शंकर ने सजातीय-विजातीय भेद रहित अद्वैत एकरस ब्रह्म को ही परमतत्व कहा है। और वल्लभाचार्य का भी यह कथन है कि ब्रह्म माया सम्बन्ध से रहित होने के कारण शुद्ध है। शंकर ने जल में प्रतिबिम्बित सूर्य के दृष्टांत से जीव को ब्रह्म का प्रतिबिम्ब माना है। उसी प्रकार वल्लभ ने जल में प्रतिबिम्बित चंद्र के दृष्टांत से यह प्रतिपादित किया है कि देहादि का जन्म, बंध, दु:खादि रूप धर्म जीव का ही है, ईश्वर का नहीं। शंकर केवल द्वैतवादी हैं, जबकि वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैतवादी। शंकर के अनुसार ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है। जगत् की व्यावहारिक सत्ता होने पर भी उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है। मायिक होने के कारण वह मिथ्या है। शंकर वेदान्त में मायाशक्ति अविद्यात्मिका एवं मिथ्या है, जबकि शुद्धाद्वैत वेदान्त में माया को ही पारमार्थिक सत्य माना गया है। शंकर के अनुसार माया का मिथ्यात्व उसकी अनिर्वचनीयता पर आधारित है (शंकर ने मायिक जगत को मिथ्या माना है), जबकि वल्लभाचार्य के अनुसार कार्यरूप जगत् ब्रह्म की ही आविर्भाव दशा होने के कारण सत्य है। शंकर ने ब्रह्म को जगत् का निमित्त कारण और माया को उपादान कारण माना है। दूसरे शब्दों में, शंकर के मतानुसार मायाशक्ति के कारण ब्रह्म जगत् का निमित्तकारण और उपादान कारण भी है, जबकि वल्लभ ब्रह्म को जगत् का समवायिकारण मानते हैं, क्योंकि जीव और जगत् को उन्होंने ब्रह्म का कार्यरूप माना है। शंकर ब्रह्म को अधिष्ठान और जगत् को अध्यारोप का फल जताते हैं। वे जगत् को ब्रह्म का विवर्त कहते हैं, जबकि वल्लभ इस संदर्भ में अविकृत परिणामवाद को स्वीकार करते हैं।


वल्लभ के अनुसार जीव और ब्रह्म में अंशांशिभाव है, जबकि शंकर के अनुसार जीव स्वरूपत: ब्रह्म ही है। शंकर यह मानते हैं कि जीव की सत्ता अविद्योपाधिक होने के कारण मिथ्या है, परन्तु वल्लभ जीव को भी मिथ्या नहीं, अपितु सत्य मानते हैं। शंकर का मत है कि ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती, यानी जब तक जीव को स्वरूप ज्ञान (अहं ब्रह्मास्मि, यह ज्ञान) नहीं होता, तब तक मोक्ष नहीं मिल सकता, जबकि वल्लभ का यह विचार है कि भक्ति से ही मुक्ति मिल सकती है, ज्ञान से नहीं। वल्लभाचार्य का सिद्धांतपक्ष शुद्धाद्वैत और आचार पक्ष पुष्टिमार्ग के नाम से विख्यात है। यह पुष्टिमार्ग सेवामार्ग भी कहलाता है। सेवामार्ग के दो भाग हैं- नामसेवा और रूपसेवा। रूपसेवा के भी तीन प्रकार हैं- तनुजा, वित्तजा और मानसी। मानसी सेवा के दो मार्ग हैं- मर्यादा मार्ग और पुष्टिमार्ग।


वल्लभ के अनुसार संसारी जीव ममत्व और माया के वशीभूत होकर ब्रह्म से विच्छिन्न होता है। पतिरूप या स्वामी रूप से ब्रह्म (श्रीकृष्ण) की सेवा करना उसका धर्म है। ब्रह्म रमण करने की इच्छा से जीव और जड़ का आविर्भाव करता है। ब्रह्म निर्गुण और सगुण दोनों है, अत: श्रीकृष्ण कहलाता है। अग्नि के स्फुलिंगों की भांति जीव अनेक हैं। व्यामोहिका माया से बद्ध संसारी जीव जब भक्ति से अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं, तब मुक्त कहलाते हैं। वल्लभ कहते हैं कि अविद्या का सम्बन्ध होने से संसारी जीव दो प्रकार के होते हैं- दैव और आसुर। दैव जीव के भी दो भेद हैं-मर्यादा मार्गीय और पुष्टि मार्गीय।


भागवत के कथन 'पोषणं तदनुग्रह:' के अनुसार इस मार्ग का साधक भगवान के अनुग्रह से पोषित होता है। अनुग्रह के सम्बन्ध में मुंडोकपनिषद में भी उल्लेख मिलता है। आचार्य वल्लभ ने अणुभाष्य में स्वयं भी यह लिखा है कि-


'मर्यादा मार्ग में ज्ञान आदि से मुक्ति मिलती है, पर पुष्टिमार्ग में ईश्वर की कृपा या अनुग्रह से ही। यानी मनुष्य का निजी उद्योग नहीं बल्कि भगवदानुग्रह ही मुक्ति का साधन है।' अन्य सभी भक्तिसम्प्रदाय मर्यादा-मार्गी हैं। मुक्ति के सम्बन्ध में वल्लभाचार्य लिखते हैं कि-


'मुक्तिस्तु भक्त्या इति भाव:। तथा तत्र निरुपधिप्रीतिरेव मुख्या नानयत्।'


पुष्टिमार्ग

〰️〰️〰️पुष्टिमार्ग के अनुसार पुष्टि चार प्रकार की होती है- (1) प्रवाह पुष्टि- इसमें सांसारिक कार्यों के साथ ही साधक भगवान की प्राप्ति में प्रयत्नशील रहता है।

(2) मर्यादापुष्टि- इसमें विषय भागों से संयम करके श्रवण कीर्तनादि में अग्रसर होता है।

(3) पुष्टि भक्ति- इसमें अनुग्रह प्राप्त साधक भक्ति के साथ ज्ञान की प्राप्ति में भी संलग्न रहता है।

(4) शुद्ध पुष्टि- इसमें भक्त भगवान के प्रेम में निमग्न हो जाता है।

वल्लभ के अनुसार भक्ति की तीन भूमियां होती हैं-


प्रवृत्ति (प्रेम),

आसक्ति

व्यसन।

वल्लभ ने भक्ति पथ के तीन सौपान माने हैं- (क) गुरु सेवा- यथा श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है-'यस्य देवे पराभक्ति: यथा देवे तथा गुरी'। गरुड़ पुराण में भी यह उल्लेख है कि 'स्मुक्तिहा गुरुवागेका विद्या: सर्वाविडम्बिका। तस्माद् ज्ञानेनात्मतत्वं विशेषं श्री गुरोर्मुखात्'।

(ख) सन्त सेवा- जैसे कि गरुड़ पुराण में भी लिखा है- 'सत्संगश्च विवेकश्च निर्मलं नयनद्वयम्। यस्य नास्ति नर: सोऽन्ध: कथं न स्याद् कुमार्गग:'।

(ग) प्रभु सेवा- इसमें नामस्मरण और स्वरूप सेवा दोनों की प्रधानता है। स्वरूप सेवा क्रियात्मक और भावात्मक दोनों प्रकार की है। भावात्मक सेवा माननीय है तथा क्रियात्मक सेवा के दो विभाग है, तनुजा और और वित्तजा। इस सेवासाधाना का प्रमुख आधार है प्रेम, जो भगवान के अनुग्रह से ही उत्पन्न होता है। इसी कारण इसको प्रेम लक्षणसाधना अथवा पुष्टिमार्गीय भक्ति कहते हैं। गुरु सेवा और संत सेवा का पर्यवसान भी प्रभु में ही है।


पुष्टिमार्ग सेवा

〰️〰️〰️〰️〰️पुष्टिमार्गीय सेवा में क्रियात्मक सेवा के पश्चात् भावनात्मक सेवा की सम्भावना मानी गई है। वल्लभाचार्य ने अनुभव किया कि यदि तनुजा और वित्तजा नामक बाह्य शक्तियां प्रभु की सेवा में लगा दी जाएं तो इसमें ममता और अंहकार का नाश होगा और फिर भावात्मक सेवा भक्त को प्रभु की ओर प्रवृत्त कर देगी। इसी को समर्पण कहते हैं। सूरदास के शब्दों में समर्पण की भावना इस प्रकार व्यक्त होती है कि-


'सब तजि तुव शरणागत आयो निजकर चरण गहेरे।'


श्रीकृष्ण की लीला के ध्यान में अपने जीवन श्रम को भुला देना और इन्हीं के भजन में मन को अनुरक्त रखना पुष्टिमार्गीय सेवा की विशिष्टता है। यह सेवा दो प्रकार की होती है-


नित्य सेवा

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वर्षोत्सव सेवा।

नित्य सेवा के आठ अंग

मंगला- इसके तीन अंग हैं- (क) जगाना, (ख) कलेऊ, (ग) आरती।

श्रृंगार

ग्वाल

राजभोज

उत्थापत

भोग

संख्या

आरती और गायन।

वर्षोत्सव सेवा

वर्षोत्सव सेवाविधि के अवसर निम्नलिखित माने जाते हैं- 1.फूलडोल, 2.होली, 3.व्रतचर्चा, 4.रासलीला, 5.गोवर्धन-पूजा, अन्नकूट। पुष्टिमार्गीय भक्ति प्रेमलक्षण है। वल्लभ ने प्रेम का आदर्श गोपिकाओं को माना है।


गोपिकाएं

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गोपिकाएं तीन प्रकार की हैं।


कुमारिकाएं👉 जिन्होंने कात्यायनी का व्रत रखकर पतिरूप में कृष्ण को कामना की, उनका प्रेम स्वकीय प्रेम है और मर्यादा पुष्टि के अंतर्गत आता है।


गोपांगनाएं👉 गोपांनाओं ने लोक और वेद दोनों की मर्यादा का अतिक्रमण करके परकीया भाव से प्रेम किया था। इस प्रेम भाव को पुष्टि-पुष्टिमार्गीय कहा जाता है।


व्रजांगनाएं👉 व्रजांगनाओं का प्रेम मातृभाव का था। उसका सम्बन्ध नित्य सेवा विधि से रहा। आचार्य वल्लभ स्वयं भी एक स्थान पर लिखते हैं कि-

कृष्णाधीना तु मर्यादा स्वाधीना पुष्टिरुच्यते।


पुष्टिमार्गीय भक्ति में भाव

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पुष्टिमार्गीय भक्ति में ये भाव उपलब्ध होते हैं-


वात्सल्य

कान्तभाव (स्वकीया और परकीया)

ब्रह्मभाव

सख्यभाव।


आध्यात्मिकता के साथ लौकिकता का सामंजस्य इतना किसी अन्य भक्ति मार्ग में नहीं हुआ, जितना की पुष्टिमार्ग में। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि भारतीय चिन्तन धारा और भक्ति पद्धति में वल्लभाचार्य ने जो योगदान किया उसका अपना विशिष्ट महत्त्व और प्रभाव है।


आचार्य जी के प्रवचन स्थल

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️श्री वल्लभाचार्य जी ने अपनी यात्राओं में जहाँ श्रीमद्भागवत का प्रवचन किया था अथवा जिन स्थानों का उन्होंने विशेष माहात्म्य बतलाया था, वहाँ उनकी बैठकें बनी हुई हैं, जो 'आचार्य महाप्रभु जी की बैठकें' कहलाती हैं। वल्लभ संप्रदाय में ये बैठकें मन्दिर देवालयों की भाँति ही पवित्र और दर्शनीय मानी जाती है। इन बैठकों की संख्या 84 है, और ये समस्त देश में फैली हुई हैं। इनमें से 24 बैठकें ब्रजमंडल में हैं, जो ब्रज चौरासी कोस की यात्रा के विविध स्थानों में बनी हुई हैं। ब्रज स्थिति बैठकों को विवरण इस प्रकार हैं-


गोकुल में👉 गोविन्दघाट पर है, जो संवत 1550 में आचार्य जी के सर्वप्रथम ब्रज में पधारने और वहां भागवत का प्रचलन करने के अनन्तर दामोदरदास हरसानी को ब्रह्म संबंध की प्रथम दीक्षा देने की स्मृति में बनाई गई है।


गोकुल में👉 श्री द्वारकानाथ जी के मन्दिर के बाहर है, जो 'बड़ी बैठक' कहलाती है।

गोकुल में 👉 शैया मन्दिर की बैठक के नाम से प्रसिद्ध है।

मथुरा में 👉 विश्राम घाट पर है, जो संवत 1550 में आचार्य जी के प्रथम बार मथुरा पधारने और वहाँ की 'यंत्र-बाधा' के निवारण एवं श्रीमद् भागवत की कथा कहने की स्मृति में बनाई गई है।

मधुवन में 👉 कृष्णकुण्ड पर है।

कुमुदबन में 👉 बिहार कुण्ड पर है।

बहुलाबन में 👉 कुण्ड पर वट वृक्ष के नीचे है।

राधाकुण्ड में 👉 वल्लभघाट पर है।

राधाकुण्ड में 👉 चकलेश्वर के निकट मानसी गंगा के गंगा घाट पर है।

गोवर्धन में 👉 चंद्रसरोवर पर छोंकर के वृक्ष के नीचे है।

गोवर्धन में 👉 आन्यौर में सद्दू पाँडे के घर में है। इस स्थल पर श्री आचार्य जी ने संवत 1556 में श्रीनाथ जी की आरम्भिक सेवा का आयोजन किया था।

गोवर्धन में 👉 गोविन्द कुण्ड पर है।

गोवर्धन में 👉 जतीपुरा में श्री गिरिराज जी के मुखारविंद के सन्मुख है। यहाँ पर श्रीनाथ जी के प्राकट्य की स्मृति में ब्रज-यात्रा के अवसर पर 'कुनवाड़ा' किया जाता है।


कामवन में 👉 श्रीकुण्ड पर है।

बरसाना में 👉 गह्वरवन के कृष्णकुण्ड पर है।

करहला में 👉 कृष्णकुण्ड पर है।

संकेत में 👉 कुण्ड पर छोंकर के वृक्ष के नीचे है।

प्रेमसरोवर में 👉 कुण्ड पर है।

नन्दगांव में 👉 पान सरोवर पर है।

कोकिलाबन में 👉 कृष्णकुण्ड पर हैं।

शेषशायी में 👉 क्षीरसागर कुण्ड पर है।

चीरघाट में 👉 यमुना तट पर कात्यायनी देवी के मन्दिर के निकट है।

मानसरोवर 👉 कुण्ड पर है।

वृन्दावन में 👉 वंशीवट पर है।


संकलित...

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Monday, July 8, 2024

बजरंगी तेरा क्या कहना

 तेरे सीने में बसे रघुराई

बजरंगी तेरा क्या कहना

तूने सोने की लंका जलाई

बजरंगी तेरा क्या कहना


संजीवनी तुम लाये सेवा से

हनुमत रामा को तुम रिजाये

प्रभु भक्ती तुमने निभाई

बजरंगी तेरा क्या कहना





अशोक वाटिका जाकर

सीता जी से मिल आये

राम जी की अंगूठी लेके

सिया माँ तक पहुचाये

सिया माँ की दया तूने पायी

बजरंगी तेरा क्या कहना


मैंने तुझे है पूजा भाये न कोई दुजा

सारे धाम घूम आई हनुमान धारा मन बाई

तेरी मूरत मन में वसाई

बजरंगी तेरा क्या कहना

*🌹 जयश्री राम🌹*

Sunday, July 7, 2024

जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व

 🙏🏻  😌  🕉️  😌  🙏🏻

*जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व  ::*

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*आत्मा व परमात्मा की दृष्टि से इस प्रकार के भौतिक संसार की भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्परागत मान्यताएं व उत्सव का महत्व  साधारण मनुष्य को भिन्न-भिन्न प्रकार से समझ में आती है..!!*

*एक योगी साधक के दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है..।*

_" आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥"_


_" इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।_ 

_आत्मेन्द्रिय मनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥"_


*"आत्मा को रथी जानो और शरीर को रथ । बुद्धि को सारथी जानो और इस मन को लगाम ॥*

*इन्द्रियाँ घोड़ों  के सामान हैं । विषय उन घोड़ों के विचरने के मार्ग हैं । इन्द्रियों और मन के साथ युक्त हुआ वह आत्मा ही भोक्ता है । ऐसा ही मनीषी कहते हैं ॥*

     ( कठ-उपनिषद :: २/३/३-४)


*जगन्‍नाथ रथ यात्रा में वास्तविक जगत के नाथ कौन है ?? जगत के नाथ एक ही है , अनेक नहीं ।  उस नाथ को "तस्यवाचक प्रणव: कहां जाता है । यानी प्रणव एक ब्रह्म ही अनंत कोटि ब्रह्मांड के एकमात्र नायक है , वही जगह के नाथ है । वह ब्रह्म कण-कण में बिराजमान है,  हर प्राणीओं के अंदर में विराजमान है ।  तो उसे हम कैसे जाने !?  इसीलिए यमराज जी नचिकेता को जो उपदेश किया है कठोपनिषद की वाणी से यह स्पष्ट होता है ।*


*पौराणिक दृष्टिकोण से चिन्तन करें तो - साधारण जनता-जनार्दन को गहरी ब्रह्म-तत्व समझ में न आने के कारण राजा महाराजा लोग कुछ चतुर विद्वान ब्राह्मण लोगों को भौतिक सुख प्राप्ति के साथ जोड़कर असली तत्व से विमुख किया ।*  

*योगेश्वर श्रीकृष्ण के अवतार जगन्‍नाथजी की रथयात्रा में शामिल होने का पुण्य तो है ।  जगन्‍नाथ रथयात्रा दस दिवसीय महोत्सव होता है । यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है । भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं । साथ ही यहां बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं । आइए आपको बताते हैं इस यात्रा का इतिहास और तीनों रथों के बारे में खास बातें...!!*

*रथ यात्रा का इतिहास  पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा इन्द्रद्युम्न  जगन्‍नाथ प्रभु को शबर राजा से यहां लेकर आए थे,  तथा उन्होंने ही मूल मंदिर का निर्माण कराया था , जो बाद में नष्ट हो गया । इस मूल मंदिर का कब निर्माण हुआ और यह कब नष्ट हो गया इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है । ऐसा माना जाता है कि वर्तमान 65 मीटर ऊंचे मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल गंगदेव तथा अनंग भीमदेव ने कराया था ।*




💐बुजुर्ग महिला💐

 *🛕जय श्री राम🙏*


*💐बुजुर्ग महिला💐*




एक बुज़ुर्ग शिक्षिका भीषण गर्मीयों के दिनों में बस में सवार हुई, पैरों के दर्द से बेहाल, लेकिन बस में सीट न देख कर जैसे – तैसे खड़ी हो गई। कुछ दूरी ही तय की थी बस ने कि एक उम्रदराज औरत ने बड़े सम्मानपूर्वक आवाज़ दी, "आ जाइए मैडम, आप यहाँ बैठ जाएं” कहते हुए उसे अपनी सीट पर बैठा दिया। खुद वो गरीब सी औरत बस में खड़ी हो गई। मैडम ने दुआ दी, "बहुत-बहुत धन्यवाद, मेरी बुरी हालत थी सच में।"

  उस गरीब महिला के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई।

   कुछ देर बाद शिक्षिका के पास वाली सीट खाली हो गई।  लेकिन महिला ने एक और महिला को, जो एक छोटे बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी और मुश्किल से बच्चे को ले जाने में सक्षम थी, को सीट पर बिठा दिया।

     अगले पड़ाव पर बच्चे के साथ महिला भी उतर गई, सीट खाली हो गई, लेकिन नेकदिल महिला ने बैठने का लालच नहीं कीया, बस में चढ़े एक कमजोर बूढ़े आदमी को बैठा दिया जो अभी अभी बस में चढ़ा था।

सीट फिर से खाली हो गई। बस में अब गिनी – चुनी सवारियां ही रह गईं थीं। अब उस अध्यापिका ने महिला को अपने पास बिठाया और पूछा, "सीट कितनी बार खाली हुई है लेकिन आप लोगों को ही बैठाते रहे, खुद नहीं बैठे, क्या बात है?"

     महिला ने कहा, "मैडम, मैं एक मजदूर हूं, मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं कुछ दान कर सकूं।"  

तो मैं क्या करती हूं कि कहीं रास्ते से पत्थर उठाकर एक तरफ कर देती हूं,  कभी किसी जरूरतमंद को पानी पिला देती हूं, कभी बस में किसी के लिए सीट छोड़ देती हूं, फिर जब सामने वाला मुझे दुआएं देता है तो मुझे अपनी गरीबी भूल जाती है। दिन भर की थकान दूर हो जाती है ।  और तो और, जब मैं दोपहर में रोटी खाने के लिए बैठती हूं ना बाहर बेंच पर, तो ये पंछी चिड़ियां पास आ के बैठ जाते हैं, रोटी डाल देती हूं छोटे-छोटे टुकड़े करके। जब वे खुशी से चिल्लाते हैं, तो उन भगवान के जीवों को देखकर मेरा पेट भर जाता है। पैसा धेला न सही, सोचती हूं दुआएं तो मिल ही जाती है ना मुफ्त में। फायदा ही है ना, और हमने लेकर भी क्या जाना है यहां से

    शिक्षिका अवाक रह गई, एक अनपढ़ सी दिखने वाली महिला इतना बड़ा पाठ जो पढ़ा गई थी उसे ।

अगर दुनिया के आधे लोग ऐसी सोच को अपना लें तो धरती स्वर्ग बन जाएगी।  लेकिन सच तो यह है कि सत्य बहुत सरल है, एक साधारण इच्छा की तरह।  कोई मेकअप नहीं, कोई तामझाम नहीं।  लेकिन इसकी खूबसूरती यही है कि यह बेहद खूबसूरत होता है।



*

💐ईश्वर के दर्शन💐

  *🛕जय श्री राम🙏*


*आज की कहानी*


*💐ईश्वर के दर्शन💐*


अश्वघोष को वैराग्य हो गया। संसार से विरक्त होकर उन्होंने घर-परिवार त्याग दिया और ईश्वर-दर्शन की अभिलाषा में इधर-उधर भटकने लगे। 


भूखे- प्यासे वह एक किसान के पास पहुंचे। किसान अपने खेत में प्रसन्नचित्त काम कर रहा था। अश्वघोष को आश्चर्य हुआ। वह सोच नहीं पा रहे थे कि किसान की खुशी का रहस्य क्या हो सकता है। 


अश्वघोष ने पूछ ही लिया, *"मित्र, तुम्हारी प्रसन्नता का रहस्य क्या है?"* 


उसने हंसते हुए उत्तर दिया, *"ईश्वर-दर्शन"*


यह सुनकर अश्वघोष चौंके। उन्होंने किसान से कहा,  *"मुझे भी उस परमात्मा का दर्शन कराओ।"* 


किसान ने कहा, *"कराता हूँ।"*


उसने थोड़े चावल निकाले, उन्हें पकाया। फिर उसके दो भाग किये। एक अपने लिए और दूसरा अश्वघोष के लिए। दोनों ने चावल खाए। फिर किसान अपने काम में लग गया। कई दिन का थका होने के कारण अश्वघोष सो गए। 


जब वह सोकर उठे तो अद्भुत स्फूर्ति महसूस कर रहे थे। उनके चेहरे पर संतोष का भाव था। किसान ने उन्हें देखकर मुस्कुराते हुए पूछा,"अच्छी नींद आई न?"


वह बोले, "हाँ, बहुत दिनों बाद इतना सुख मिला। मैं समझ गया मित्र। कर्म से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है। घर से भागकर भटकने से नहीं। तुम दिन-रात मेहनत करते हो, इसलिए सही अर्थों में तुम ही ईश्वर के निकट हो।"

कस्बे मे एक छोटी सी स्टैशनेरी की दुकान थी

 कस्बे मे एक छोटी सी स्टैशनेरी की दुकान थी - दुकान के मालिक का नाम प्रेमू था। मेरे बचपन का सपना था एक दिन बहुत पैसे  कमाऊँगा और प्रेमू की दुकान से मन भर कर शॉपिंग करूंगा। हम सभी बच्चों ने अपनी विश लिस्ट भी बना रखी थी कि अंडा वाली बाल, चिड़िया, ढेर सारी पापीन्स, टंकी वाला निब पेन यह सब खरीद लेंगे। 

जाहिर सी बात है जब बड़े हुवे, इस लायक हुवे कि यह सब खरीद सकें तो इनकी जरूरत नहीं रह गई। 

जब छोटा घर था तो रहने वाले इतने लोग होते थे कि एक एक कमरे मे दस बारह लोग हों। जब घर बड़ा हुआ रहने वाले लोग उसी अनुपात मे कम होते गए। 

जब खाने की इच्छाएं और सामर्थ्य होता है, तब पैसे नहीं होते हैं। जब पैसे आते हैं तब डाइबीटीज जैसी ढेरों बीमारियाँ या जाती हैं और अब खा  नहीं सकते हैं। 

जब घूमने का वक्त था, तब समय नहीं था नौकरी और जिंदगी के जंजाल मे। जब वक्त हुआ तो शरीर जवाब दे चुका था। 

जब चार हजार तनख्वाह होती है, तो लगता है अभी क्या दान दक्षिणा दें, चालीस हजार तनख्वाह हो जाए आधी तनख्वाह धर्म कर्म पर खर्च करूंगा। तनख्वाह चार लाख हो जाती है, तीन लाख ईएमआई मे चले जाते हैं, महीने के अंत तक उधारी हो जाती है। 

जब रिश्ते निभाने की सामर्थ्य, इच्छा और शक्ति होती है तब रिश्ते नहीं होते हैं। बुढ़ापे तक आते आते सैंकड़ों रिश्ते बन चुके होते हैं पर अब वह अच्छे नहीं लगते, खुद से प्यार हो जाता है। 

ईश्वर ने आक्सीजन मुफ़्त दी है। आजीवन उसका मुफ़्त उपभोग करते हैं। अंतिम समय पता लगता है यह तो अनमोल थी। कितनी भी कीमत दे लो अंत मे इसी की कमी से प्राण चले जाते हैं। 

माँ का प्रेम, प्रेयसी / पत्नी का प्यार, सूर्य की किरणें, चंद्रमा की चाँदनी सब मुफ़्त है। तब इसकी कद्र नहीं होती। जब इसकी कद्र करना आता है तब तक यह हाथ से निकल चुके होते हैं। 

जिंदगी का सच यही है। जब चीजें उपलब्ध होती हैं, तो उनकी उतनी वैल्यू नहीं होती है। जब वैल्यू पता लगती है तो चीजें गायब हो चुकी होती हैं।  जब जहां जिस क्षण पर हैं, उसे ही परफेक्ट मानते हुवे जिंदगी का हर क्षण जीते हुवे चलें। कल की प्रतीक्षा न करें।🙏🙏

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है*

*जिसका मन मस्त है*

*उसके पास समस्त है!!*

*आपका हर पल मंगलमय हो *

आज का चिंतन

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आज का चिंतन #


*बंधन तोड़ो ना* 


हमारे ऊपर पारिवारिक, 

व्यवसायिक या सामाजिक 

बंधन तो होते ही हैं, लेकिन 

जो हमारे व्यवहार को 

सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं 

वह हमारे खुद के मन के, 

विचारों के, आदतों के, 

सोचने की क्षमता के, 

मानसिकता के 

बंधन ही तो होते हैं।


*दो संसार* 

हमारे बाहर का जो संसार है 

उस पर हमारा नियंत्रण

लगभग शून्य  होता है, 

लेकिन हमारे अंदर 

का जो संसार है, 

वह हमारी सोच, 

आदतों, समझ, परिपक्वता 

इत्यादि का होता है और 

उस पर शत प्रतिशत नियंत्रण 

हमारा स्वयं का ही होता है, 

या प्रयास करने से हो सकता है।


*भूल* 

हमारी भूल यह हो जाती है 

कि हम अधिकांशतः 

अपनी ऊर्जा और शक्ति 

का अधिकतम भाग 

बाहरी संसार को, 

अन्य लोगों को 

बदलने में 

व्यय, खर्च कर देते हैं।


*उपाय* 

एकमात्र उपाय यही है कि हम 

अपनी आत्म शक्ति और चेतना 

और कर्मण्यता को 

अधिकतम विस्तार दें, 

स्वयं पर परिश्रम करें और 

दूसरी ओर 

बाहरी संसार में 

न्यूनतम विरोध के साथ 

स्वयं को सदैव 

प्रगति की राह पर बढ़ाते रहें 

सहयोग लेते और देते है 

🙏 ये 15 मंत्र जो....हर हिंदू को सीखना और बच्चों को सिखाना चाहिए

  🙏 ये 15 मंत्र  जो....हर हिंदू को सीखना और बच्चों को सिखाना चाहिए,


1. Mahadev

          ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, 

           सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ,

           उर्वारुकमिव बन्धनान्,

           मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!


2. Shri Ganesha

              वक्रतुंड महाकाय, 

              सूर्य कोटि समप्रभ 

              निर्विघ्नम कुरू मे देव,

              सर्वकार्येषु सर्वदा !!


3. Shri hari Vishnu

           मङ्गलम् भगवान विष्णुः,

           मङ्गलम् गरुणध्वजः।

           मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः,

           मङ्गलाय तनो हरिः॥


4. Shri Brahma ji

             ॐ नमस्ते परमं ब्रह्मा,

              नमस्ते परमात्ने ।

              निर्गुणाय नमस्तुभ्यं,

              सदुयाय नमो नम:।।


5. Shri Krishna

               वसुदेवसुतं देवं,

               कंसचाणूरमर्दनम्।

               देवकी परमानन्दं,

               कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।


6. Shri Ram

              श्री रामाय रामभद्राय,

               रामचन्द्राय वेधसे ।

               रघुनाथाय नाथाय,

               सीताया पतये नमः !


7. Maa Durga

            ॐ जयंती मंगला काली,

            भद्रकाली कपालिनी ।

            दुर्गा क्षमा शिवा धात्री,

            स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।


8. Maa Mahalakshmi

            ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,

            धन धान्यः सुतान्वितः ।

            मनुष्यो मत्प्रसादेन,

            भविष्यति न संशयःॐ ।


9. Maa Saraswathi

            ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं,

             वरदे कामरूपिणि।

             विद्यारम्भं करिष्यामि,

             सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।


10. Maa Mahakali

             ॐ क्रीं क्रीं क्रीं,

             हलीं ह्रीं खं स्फोटय,

             क्रीं क्रीं क्रीं फट !!


11. Hanuman ji

          मनोजवं मारुततुल्यवेगं,

          जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।

          वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,

          श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥


12. Shri Shanidev

             ॐ नीलांजनसमाभासं,

              रविपुत्रं यमाग्रजम ।

              छायामार्तण्डसम्भूतं, 

              तं नमामि शनैश्चरम् ||


13. Shri Kartikeya

        ॐ शारवाना-भावाया नम:,

         ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा ,

         वल्लीईकल्याणा सुंदरा।

          देवसेना मन: कांता,

          कार्तिकेया नामोस्तुते ।


14. Kaal Bhairav ji

          ॐ ह्रीं वां बटुकाये,

          क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये,

          कुरु कुरु बटुकाये,

          ह्रीं बटुकाये स्वाहा।


15. Gayatri Mantra

            ॐ भूर्भुवः स्वः,

            तत्सवितुर्वरेण्यम् 

            भर्गो देवस्य धीमहि 

            धियो यो नः प्रचोदयात् ॥


 खुद भी सीखे और परिवार / बच्चों को भी सिखायें🙏

*🚩🙏 जगन्नाथ मंदिर के रहस्य जो वैज्ञानिक तर्क को चुनौती देते हैं 🙏🚩

 *🚩🙏 जगन्नाथ मंदिर के रहस्य जो वैज्ञानिक तर्क को चुनौती देते हैं 🙏🚩*

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पुरी का प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर भक्तों के लिए एक प्रमुख स्थान रखता है। यह भारत के चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है, और वार्षिक रथ उत्सव या रथ यात्रा के लिए भी प्रसिद्ध है। यदि विभिन्न किंवदंतियों पर विश्वास किया जाए, तो राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु के आशीर्वाद के बाद इस पवित्र मंदिर का निर्माण किया और उन्हें नील माधव को खोजने के लिए सपने में मार्गदर्शन किया।


एक बार पवित्र नदी में डुबकी लगाने के दौरान राजा इंद्रद्युम्न को एक लोहे की छड़ तैरती हुई मिली। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने उन्हें फुसफुसाकर बताया कि यह तैरती हुई छड़ उनका हृदय है, जो हमेशा धरती पर रहेगा। इसके बाद राजा उस छड़ को लेकर भगवान जगन्नाथ के पास गए और उसे चुपके से अपने हृदय में रख लिया। उन्होंने कभी किसी को उस छड़ को देखने या छूने की अनुमति नहीं दी।


यह भी माना जाता है कि जब पांडवों ने यमराज के पास अपनी यात्रा शुरू की, तो सप्त ऋषियों ने उन्हें मोक्ष के करीब पहुंचने के लिए 'चार धाम' की यात्रा करने की सलाह दी। और, पुरी में जगन्नाथ मंदिर 'चार धाम' के पवित्र स्थानों में से एक है। तब से, जगन्नाथ की मूर्ति हमेशा लोगों के लिए वर्जित रही है, और भक्त उन्हें केवल एक निश्चित अवधि के लिए ही देख सकते हैं।


इन सभी तथ्यों के अलावा, पुरी में जगन्नाथ मंदिर कुछ रहस्यों के लिए भी जाना जाता है, जिनका कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं है। लोगों का मानना है कि ये रहस्य वास्तव में भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद हैं। इस पर विश्वास करने के लिए आपको इस स्थान पर जाना होगा।


*🚩 मंदिर का ध्वज जो तर्क को चुनौती देता है 🚩*


मंदिर के ऊपर लगा झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। विपरीत दिशा में लहराता झंडा आपकी वैज्ञानिक सोच को रोक देता है और आप यह मानने लगते हैं कि विज्ञान से भी ज़्यादा शक्तिशाली कोई शक्ति है।


*🚩 सुदर्शन चक्र 🚩*


चक्र वास्तव में 20 फीट ऊंचा है और इसका वजन एक टन है। इसे मंदिर के ऊपर लगाया गया है। लेकिन इस चक्र के बारे में दिलचस्प बात यह है कि, आप इस चक्र को पुरी शहर के किसी भी कोने से देख सकते हैं। चक्र की स्थापना और स्थिति के पीछे का इंजीनियरिंग रहस्य अभी भी एक रहस्य है क्योंकि आप चाहे जिस भी स्थिति में हों, आप हमेशा महसूस कर सकते हैं कि चक्र आपकी ओर ही है।


*🚩 मंदिर के ऊपर कोई विमान या पक्षी नहीं उड़ता 🚩*


आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मंदिर के ऊपर कोई पक्षी या विमान नहीं उड़ता है। इसके विपरीत, भारत के किसी अन्य मंदिर में ऐसा होना दुर्लभ है। यह स्थल वास्तव में नो-फ्लाई ज़ोन है, जिसे किसी राज्य शक्ति द्वारा नहीं, बल्कि किसी दैवीय शक्ति द्वारा घोषित किया गया है। इस घटना का भी स्पष्ट रूप से कोई स्पष्टीकरण नहीं है। यह अभी भी एक रहस्य बना हुआ है।


*🚩 मंदिर की संरचना 🚩*


मंदिर की संरचना ऐसी है कि दिन के किसी भी समय इसकी कोई छाया नहीं पड़ती। यह अभी भी पता लगाना बाकी है कि यह एक इंजीनियरिंग चमत्कार है या एक ऐसी घटना जिसे केवल दैवीय शक्ति के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।


*🚩 सिंहद्वारम का रहस्य 🚩*


जगन्नाथ मंदिर में चार दरवाज़े हैं, और सिंहद्वारम मंदिर में प्रवेश का मुख्य द्वार है। जब आप सिंहद्वारम से प्रवेश करते हैं, तो आप लहरों की आवाज़ साफ़ सुन सकते हैं, लेकिन एक बार जब आप सिंहद्वारम से गुज़र जाते हैं, तो बस एक मोड़ लें और उसी दिशा में वापस चलें, आपको लहरों की आवाज़ सुनाई नहीं देगी। वास्तव में, जब तक आप मंदिर के अंदर हैं, तब तक आपको लहरों की आवाज़ सुनाई नहीं देगी।


*🚩 समुद्र का रहस्य 🚩*


दुनिया के किसी भी हिस्से में आपने देखा होगा कि दिन के समय समुद्र से हवा ज़मीन की ओर आती है, जबकि शाम के समय ज़मीन से हवा समुद्र की ओर चलती है। लेकिन पुरी में भौगोलिक नियम भी उलटे हैं। यहाँ बिलकुल उलट होता है।


*🚩 1800 साल पुरानी रस्म 🚩*


हर दिन पुजारी 45 मंज़िला इमारत जितने ऊंचे मंदिर के शिखर पर चढ़कर झंडा बदलते हैं। यह रस्म 1800 सालों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि अगर यह रस्म कभी छूट जाती है, तो मंदिर अगले 18 सालों तक बंद रहता है।


*🚩 प्रसादम रहस्य 🚩*


जगन्नाथ मंदिर में कुछ भी बर्बाद नहीं होता। रिकॉर्ड के अनुसार, हर दिन 2,000 से 20,000 भक्त मंदिर में आते हैं। लेकिन, मंदिर में बनने वाले प्रसाद की मात्रा साल भर एक जैसी ही रहती है। फिर भी, प्रसाद कभी भी बर्बाद नहीं होता या किसी भी दिन कम नहीं होता।


*🚩 पकाने की तकनीक 🚩*


इस खास व्यंजन को पकाने के लिए लकड़ी जलाकर बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए 7 बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है और उन्हें एक के ऊपर एक रखा जाता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सबसे ऊपर वाले बर्तन की सामग्री पहले पकती है, उसके बाद सबसे नीचे वाले बर्तन पकते हैं।


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आज का संदेश

 आज का संदेश 


       हम इस पृथ्वी पर अतिथि बनकर आए हैं, मालिक नहीं, संसार में अधिकांश लोग स्वयं को यहां की संपत्तियों का मालिक समझते हैं, उनके विचार इस प्रकार के होते हैं, यह मकान मेरा है, मैं इसका मालिक हूँ, यह कार मेरी है, यह बैंक बैलेंस मेरा है, यह परिवार मेरा है, यह बेटा मेरा है, यह सम्मान मेरा है, यह विद्या मेरी है, मैं इन सब वस्तुओं का मालिक हूँ, इत्यादि।


         इस मैं और मेरी के चक्कर में बेचारे जीवन भर दुखी रहते हैं इन वस्तुओं की प्राप्ति और सुरक्षा में सारा जीवन तनाव में जीते हैं। यह नहीं कहना चाहता कि इन वस्तुओं का उपयोग और सुरक्षा न करें, यह कहना चाहता हूं कि इन वस्तुओं का उपयोग और सुरक्षा इस प्रकार से करें, जैसे किसी धर्मशाला में कोई अतिथि वहां की वस्तुओं का प्रयोग और सुरक्षा करता है। वह धर्मशाला की वस्तुओं का मालिक स्वयं को नहीं मानता, केवल उपयोगकर्ता के रूप में ही स्वयं को स्वीकार करता है।


              परंतु स्वयं को इन वस्तुओं का मालिक मानने वाले लोग, वास्तव में भ्रांतियों में जी रहे हैं, शायद आप भी ऐसा ही सोचते होंगे। जिन जिन वस्तुओं को आप, मेरा है, या मेरी है, ऐसा मानते हैं, वास्तव में उन सब वस्तुओं में से आपकी कोई भी वस्तु नहींहैं। वस्तु तो आपकी कोई भी नहीं होगी। उन वस्तुओं को प्राप्त करने का थोड़ा सा पुरुषार्थ बस आपका है, इससे अधिक कुछ नहीं।



पूजा-पाठ में आम के ही पत्ते क्यों उपयोग किये जाते हैं? जानें धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व ।

 पूजा-पाठ में आम के ही पत्ते क्यों उपयोग किये जाते हैं? जानें धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व ।



हिंदू धर्म में अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा अलग-अलग तरह से की जाती है. जिसमें भिन्न-भिन्न सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. इन पूजा-पाठ में उपयोग होने वाले कई प्रकार के फूलऔर पत्ते हैं जो शुभ माने जाते हैं। आइए जानते है ,आम के पत्तों के बारे में जिनका उपयोग शादी- विवाह ,गृह प्रवेश, बंदनवार और पूजा-पाठ में अनिवार्य माना जाता है ।. ऐसा कहा जाता है कि आम के पत्तों के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।🪔🪔🪔🪔🛕🛕🛕🛕🕉️🕉️🕉️🕉️

धार्मिक मान्यता के अनुसार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आम हनुमान जी का प्रिय फल है. जहां भी पूजा-पाठ में आम और आम के पत्ते का उपयोग किया जाता है. वहां हनुमान जी की विशेष कृपा होती है. उस जगह पर नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता. कहा जाता है बुरी शक्तियां शुभ कार्य में बाधा नहीं डाल सकती. जिसकी वजह से हर काम सफल होता है. इसके अलावा प्रकृति से मनुष्य का संबंध बना रहे इस कारण भी पूजा पाठ में आम के पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है.।


वैज्ञानिक महत्व

आम के पत्तों को लेकर वैज्ञानिक अवधारणा है, कि आम के पत्तों का जहां पर इस्तेमाल किया जाता है. वहां पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. भारतीय हिन्दू संस्कृति में आम के वृक्ष को पूजनीय माना जाता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इसके फल के अलावा इसकी लकड़ियां और पत्तियां भी बेहद लाभकारी और गुणकारी होती है। आम के पेड़ की लकड़ियों का इस्तेमाल समिधा के रूप में किया जाता है।माना जाता है इस लकड़ी को घी के साथ जलाने पर घर में सकात्मक ऊर्जा का वास होता है। इस पेड़ की पत्तियों को घर के मुख्य दरवाजे पर लटकाने से घर में सुख और समृद्धि बढ़ने के साथ सभी मंगल कार्य निर्विघ्न पूरे हो जाते हैं।

आम के पत्ते काटने के बाद कम से कम दो दिन तक ऑक्सीजन छोड़ते रहते हैं। यही कारण है कि इन्हें सभी त्योहारों और समारोहों में हवा को ताज़ा रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, खासकर जब वहाँ बहुत से लोग होते हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति हमें अपने दरवाज़े पर आम के पत्ते बांधने के लिए प्रोत्साहित करती है । हमारे ऋषियों ने सहस्राब्दियों पहले इसे जाना और इसे हमारी संस्कृति का हिस्सा बना दिया।


आम के पत्तों में विटामिन ए, बी और सी पाया जाता है. इसके अलावा ये पत्ते एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं और इनमें फ्लेवेनॉइड्स और फेनोल्स भी पाए जाते हैं. आम के पत्तों का इस्तेमाल इनके एंटी-माइक्रोबियल गुणों को देखते हुए भी होता है और ये पत्ते कई स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतो से छुटकारा दिलाने में असरदार साबित होते हैं।




जब रामकृष्ण परमहंस के पास* *आया एक अमीर सेठ।

 *जब रामकृष्ण पर


महंस के पास*

     *आया एक अमीर सेठ।*

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      * उज्जैन से-*

*एक बार एक अमीर सेठ खूब सारे पैसे लेकर स्वामी विवेकानंद जी के गुरु रामकृष्ण परमहंस जी के पास आता है और वह सारे के सारे पैसे रामकृष्ण जी के चरणों में बिखेर देता है | जिसे देख रामकृष्णजी कहते हैं बेटा इस धन की यहां कोई आवश्यकता नहीं है इसलिए तुम यह सारा धन यहां से ले जा सकते हो, यह देख सेठ खुश हो जाता है और कहता है वहा महाराज जी वाह मैंने तो आपके सिर्फ किस्से ही सुने थे आज देख भी लिया आप कितने बड़े त्यागे हैं |*


*आज के समय में जब लोग लोभ और लालच में डूबे हुए हैं ऐसे में आप जैसे त्यागी से मुलाकात हो जाना वाकई मेरे लिए एक बहुत ही बड़े सौभाग्य की बात हैं और आप त्यागी ही नहीं मेरी नजरों में महात्यागी हो | ये सारी बात सुन कर संत रामकृष्ण परमहंसजी मुस्कुराते हैं और कहते हैं, बेटा किसने कहा में त्यागी हूं,,मैं तो बहुत बड़ा लोभी, मुझ जैसा लोभी शायद ही तुम्हें मिल सके |मेरी नजर में असली त्यागी तुम हो और सिर्फ तुम्हें नहीं मुझे तो ज्यादातर लोग त्यागी ही दिखाई पड़ते हैं | आज इस उम्र में भी लगभग ना के बराबर लोग मुझे मिलें हैं जो लोभी हों |*


*यह सुन उस सेठ का दिमाग चकराने लगता है और वो सोचने लगता है, मैं और त्यागी, और यह पुराने और कुछ कपड़ों में बैठा संत जिसने इतना सारा धन ठुकरा दिया वो लोभी, सेठ को यह बात समझ ना आई और अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए वो संत से पूछता है महाराज ये आप कैसी बात कर रहे हैं मेरी यह अल्प बुद्धि इसे समझ नहीं पा रही, कृपा करके मुझे समझाए कि आखिर कैसे आप अपने आप को लोभी और मुझे त्यागी कह रह हैं |*


*यह सुन रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं, उस एक परमात्मा जिसे सब अलग अलग नामों से पुकारते हैं जिसने यह सारा संसार रचा हैं उसके आगे इन कुछ कागज के टुकड़ों का क्या मूल्य है जरा बताओ,जबाव है, कुछ भी नहीं, इसलिए मैं उस परमात्मा को ही भोगना अपना परम आनंद समझता हूं  और में उसी को बटोरने में लगा हूं| अब तुम ही बताओ कौन ज्यादा बड़ा भोगी है, मैं या तुम |*


*तुम उस सर्वशक्तिमान परमात्मा को त्याग कर उसकी रची माया में ध्यान लगाए बैठे हो और मैं इस माया को त्याग कर इसके रचियता में ध्यान लगाए बैठा हूं, तो अब तुम खुद ही मुझे बताओ की कौन है महत्यागी मैं या तुम, किसने ज्यादा बड़ा त्याग किया हुआ है, मैंने या तुमने |बताओ जरा कौन है महत्यागी जो परमात्मा का त्याग करे बैठा है या वो जो इस तुच्छ माया का त्याग करे बैठा है,तुम ही बताओ |*


*मेरी नजर में महात्यागी तो तुम ही हो, जो हीरे को छोड़ कर इन कंकड़ पत्थर को बीन रहे हो,जो बेकार है उसे संभाल रहे हो  और जो सार्थक है उसे गवां रहे हो | यह सब सुन कर सेठ कुछ नहीं बोला, उसने अपना सारा धन उठाया और अपने घर के तरफ चल दिया यह सोचते हुए की उसने अपने पूरे जीवन में क्या गवाया और क्या पाया | उसका जीवन अभी तक घाटे में रहा या फिर फायदे में |* 


*आपको भी यही सलाह है आप सभी लोभी बने ना की त्यागी, लेकिन लोभ भी उसका करें जो सर्वोत्तम है जिसके आगे फिर कुछ बचता नहीं लोभ करने को, उसके लोभी बने |*


 *|| स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जय हो ||*



*04 जुलाई गुरुवार 2024*

 *🌻प्रातः वंदन🌻*

     *^^^^^^^^^^*

*04 जुलाई गुरुवार 2024*

             *👇👇*

*छाते की तरह हो गये है रिश्ते*

*ज़रुरत के मुताबिक खोले*

*और बंद किये जाते हैं*

*दिखावे का जीवन जीना*

*बहुत कष्टदायक होता है*

*वास्तविकता कुछ और होती है और*

*वो कुछ और दिखाना चाहता है*

*भ्रम हमेशा रिश्तों को बिखेरता है।*

*प्रेम से अजनबी भी बंध जाते हैं।*

*सुख पाने के लिए इच्छाओं की कतार*

*लगाएं या आशाओं के अम्बार*

*परंतु सुख का ताला केवल*

*संतुष्टि की चाबी से ही खुलता है।*


     *|| सुप्रभात वंदन  ||*

                🙏🏾🌻🙏🏾




प्रभु नाम से कल्याण

 प्रभु नाम से कल्याण:

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एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ कर दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए |


एक दिन वह बीमार पड़ गया | अपनी झोपडी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर उसकी सेवा किया करते थे | उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था | उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अँधेरे में ही घर की और हो लिया।


जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा आधी रात के बाद भी दरवाज़ा खुला हुआ है | अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं | उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया | पुत्र की आँखों में आंसू आ गए |


उसने पिता से पूछा "ये घर का दरवाज़ा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा?" पिता ने उत्तर दिया "अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये |"


ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है | उसने भी प्रेमवश अपने भक्तो के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई कोई संतान उसकी और लौट आए।


हमें भी आवश्यकता है सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी और बढ़ चलें।


कई बार छोटे छोटे प्रसंग ही जीवन की राह बदल देते हैं।

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देवरहा बाबा

 देवरहा बाबा 

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देवरहा बाबा भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे...


डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय- समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था। 


पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।


देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के *नाथ* नदौली ग्राम, लार रोड, देवरिया जिले के रहने वाले थे।


मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं। कुंभ कैंपस में संगम तट पर धूनी रमाए बाबा की करीब 10 सालों तक सेवा करने वाले मार्कण्डेय महराज के मुताबिक, पूरे जीवन निर्वस्त्र रहने वाले बाबा धरती से 12 फुट उंचे लकड़ी से बने बॉक्स में रहते थे। वह नीचे केवल सुबह के समय स्नान करने के लिए आते थे। इनके भक्त पूरी दुनिया में फैले हैं। राजनेता, फिल्मी सितारे और बड़े-बड़े अधिकारी उनके शरण में रहते थे।


हिमालय में अनेक वर्षों तक अज्ञात रूप में रहकर उन्होंने साधना की। वहां से वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया नामक स्थान पर पहुंचे। वहां वर्षों निवास करने के कारण उनका नाम *देवरहा बाबा* पड़ा। देवरहा बाबा ने देवरिया जनपद के सलेमपुर तहसील में मइल (एक छोटा शहर) से लगभग एक कोस की दूरी पर सरयू नदी के किनारे एक मचान पर अपना डेरा डाल दिया और धर्म-कर्म करने लगे।


देवरहा बाबा परंम् रामभक्त थे, देवरहा बाबा के मुख में सदा राम नाम का वास था, वो भक्तो को राम मंत्र की दीक्षा दिया करते थे। वो सदा सरयू के किनारे रहा करते थे।


उनका कहना था  "एक लकड़ी ह्रदय को

मानो दूसर राम नाम पहिचानो

राम नाम नित उर पे मारो

ब्रह्म दिखे संशय न जानो"


देवरहा बाबा जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि-धर्म मानते थे तथा प्रत्येक दर्शनार्थी को लोगों की सेवा, गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे। देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तो को कष्ट से मुक्ति के लिए कृष्ण मंत्र भी देते थे।


"ऊं कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने

प्रणत: क्लेश नाशाय, गोविन्दाय नमो-नम:"


बाबा कहते थे जीवन को पवित्र बनाए बिना, ईमानदारी, सात्विकता-सरसता के बिना भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती। अत: सबसे पहले अपने जीवन को शुद्ध-पवित्र बनाने का संकल्प लो वे प्राय: गंगा या यमुना तट पर बनी घास-फूस की मचान पर रहकर साधना किया करते थे। दर्शनार्थ आने वाले भक्तजनों को वे सद्मार्ग पर चलते हुए अपना मानव जीवन सफल करने का आशीर्वाद देते थे। 


वे कहते इस भारत भूमि की दिव्यता का यह प्रमाण है कि इसमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने अवतार लिया है। यह देवभूमि है, इसकी सेवा, रक्षा तथा संवर्धन करना प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है


प्रयागराज में सन् 1989 में महाकुंभ के पावन पर्व पर विश्व हिन्दू परिषद् के मंच से बाबा ने अपना पावन संदेश देते हुए कहा था दिव्यभूमि भारत की समृद्धि गोरक्षा, गोसेवा के बिना संभव नहीं होगी। गोहत्या का कलंक मिटाना अत्यावश्यक है।


पूज्य बाबा ने योग विद्या के जिज्ञासुओं को हठयोग की दसों मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया। वे ध्यान योग, नाद योग, लय योग, प्राणायाम, त्राटक, ध्यान, धारणा, समाधि आदि की साधन पद्धतियों का जब विवेचन करते तो बड़े-बड़े धर्माचार्य उनके योग सम्बंधी ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हो जाते थे।


बाबा ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि वृन्दावन में यमुना तट पर स्थित मचान पर चार वर्ष तक साधना की बहुत ही कम समय में देवरहा बाबा अपने कर्म एवं व्यक्तित्व से एक सिद्ध महापुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो गए। बाबा के दर्शन के लिए प्रतिदिन विशाल जन समूह उमड़ने लगा तथा बाबा के सानिध्य में शांति और आनन्द पाने लगा। बाबा श्रद्धालुओं को योग और साधना के साथ-साथ ज्ञान की बातें बताने लगे। बाबा का जीवन सादा और एकदम संन्यासी था। बाबा भोर में ही स्नान आदि से निवृत्त होकर ईश्वर ध्यान में लीन हो जाते थे और मचान पर आसीन होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते और ज्ञान लाभ कराते थे। कुंभ मेले के दौरान बाबा अलग-अलग जगहों पर प्रवास किया करते थे। गंगा-यमुना के तट पर उनका मंच लगता था। वह 1-1 महीने दोनों के किनारे रहते थे। जमीन से कई फीट ऊंचे स्थान पर बैठकर वह लोगों को आशीर्वाद दिया करते थे। बाबा सभी के मन की बातें जान लेते थे। उन्होंने पूरे जीवन कुछ नहीं खाया। सिर्फ दूध और शहद पीकर जीते थे। श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था।


देवराहा बाबा के भक्तों में कई बड़े लोगों का नाम शुमार है। राजेंद्र प्रसाद, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और कमलापति त्रिपाठी जैसे राजनेता हर समस्या के समाधान के लिए बाबा की शरण में आते थे। देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गाँधी हार गईं तो वह भी देवराहा बाबा से आशीर्वाद लेने गयीं।


सन् 1990 की योगिनी एकादशी (19 जून) के पावन दिन उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

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