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*जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व ::*
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*आत्मा व परमात्मा की दृष्टि से इस प्रकार के भौतिक संसार की भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्परागत मान्यताएं व उत्सव का महत्व साधारण मनुष्य को भिन्न-भिन्न प्रकार से समझ में आती है..!!*
*एक योगी साधक के दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है..।*
_" आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥"_
_" इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।_
_आत्मेन्द्रिय मनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥"_
*"आत्मा को रथी जानो और शरीर को रथ । बुद्धि को सारथी जानो और इस मन को लगाम ॥*
*इन्द्रियाँ घोड़ों के सामान हैं । विषय उन घोड़ों के विचरने के मार्ग हैं । इन्द्रियों और मन के साथ युक्त हुआ वह आत्मा ही भोक्ता है । ऐसा ही मनीषी कहते हैं ॥*
( कठ-उपनिषद :: २/३/३-४)
*जगन्नाथ रथ यात्रा में वास्तविक जगत के नाथ कौन है ?? जगत के नाथ एक ही है , अनेक नहीं । उस नाथ को "तस्यवाचक प्रणव: कहां जाता है । यानी प्रणव एक ब्रह्म ही अनंत कोटि ब्रह्मांड के एकमात्र नायक है , वही जगह के नाथ है । वह ब्रह्म कण-कण में बिराजमान है, हर प्राणीओं के अंदर में विराजमान है । तो उसे हम कैसे जाने !? इसीलिए यमराज जी नचिकेता को जो उपदेश किया है कठोपनिषद की वाणी से यह स्पष्ट होता है ।*
*पौराणिक दृष्टिकोण से चिन्तन करें तो - साधारण जनता-जनार्दन को गहरी ब्रह्म-तत्व समझ में न आने के कारण राजा महाराजा लोग कुछ चतुर विद्वान ब्राह्मण लोगों को भौतिक सुख प्राप्ति के साथ जोड़कर असली तत्व से विमुख किया ।*
*योगेश्वर श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथजी की रथयात्रा में शामिल होने का पुण्य तो है । जगन्नाथ रथयात्रा दस दिवसीय महोत्सव होता है । यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है । भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं । साथ ही यहां बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं । आइए आपको बताते हैं इस यात्रा का इतिहास और तीनों रथों के बारे में खास बातें...!!*
*रथ यात्रा का इतिहास पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा इन्द्रद्युम्न जगन्नाथ प्रभु को शबर राजा से यहां लेकर आए थे, तथा उन्होंने ही मूल मंदिर का निर्माण कराया था , जो बाद में नष्ट हो गया । इस मूल मंदिर का कब निर्माण हुआ और यह कब नष्ट हो गया इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है । ऐसा माना जाता है कि वर्तमान 65 मीटर ऊंचे मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल गंगदेव तथा अनंग भीमदेव ने कराया था ।*

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