आज का संदेश
शारीरिक योग हमारे शरीर को और आंतरिक योग हमारी आत्मा को स्वस्थता प्रदान करता है इसलिए तन और मन की शुद्धता और स्वस्थता ही योग कहलाता है। योगः कर्मसु कौशलम् अर्थात् कुशलता पूर्वक किया जाने वाला कर्म ही योग है।
जो श्रेष्ठ कर्म श्रेष्ठ विधि से करते हुए जीवन के श्रेष्ठत्व की प्राप्ति कराते हुए प्रभु से संयोग का कारण बनते हैं, वही तो योग है। जिसमें हमारी बुद्धि के साथ-साथ हमारे संपूर्ण शरीर का विकास हो, नैतिकता का विकास हो, हमारी आत्मा का विकास हो और संपूर्ण जीवन का विकास हो सके यही कार्य की कुशलता कहलाती है।
श्रेष्ठ कर्मों द्वारा इस जीवन को आनंदमय बनाते हुए नर का नारायण में परिणित हो जाना अथवा जीव का शिव से जुड़ जाना ही वास्तविक अर्थों में योग कहलाता है।
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