आज का संदेश
आत्म-सम्मान का आधार दूसरों को सम्मान देने में है। गुम्बज वाले मकानों में होने वाली प्रतिध्वनि की तरह हमें वही आवाज सुनने को मिलती है जो हमने बोली थी। यदि गाली दें तो गाली और भजन गावें तो भजन वह गुंबज वाला मकान प्रति-ध्वनि के रूप में दुहरा देता है। दर्पण में हमें अपनी ही परछांई दिखाई देती है। अपना जैसा भी कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही लौटकर दिखाई पड़ता है। इस संसार का व्यवहार भी गुम्बजदार मकान या दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें सम्मान मिलते हैं।
अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा। दूसरे लोगों का व्यवहार हमें सन्तोष और सम्मान प्राप्त करने वाला हो यह हर किसी की इच्छा रहती है पर वह यह भूल जाता है कि इनको प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना होगा? मूल्य चुकाये बिना हमें संसार में कोई वस्तु नहीं मिलती।
फिर परम आनन्द और तृप्ति प्रदान करने वाली यह विभूतियाँ भी हमें अनायास ही क्यों कर मिल सकेंगी? अपने कर्तव्यों द्वारा यदि उचित मूल्य चुकाने को अपना आचरण सुधारने को तैयार रहा जाय तो कोई कारण नहीं कि आत्म-सन्तोष और आत्म सम्मान की समुचित मात्रा हमें प्राप्त न हो और आत्मा को तृप्ति की एवं प्रफुल्लता की परिपूर्ण अनुभूति का आनन्द न मिले।
No comments:
Post a Comment