_*।। भारतीय धर्म ग्रन्थ ज्ञान ।।*_
ज्ञान नकल नहीं जीवन का सम्पूर्ण परिवर्तन है।
ऋषियों द्वारा निर्धारित भारतीय ज्ञान प्रक्रिया केवल अध्ययन और स्मरण पर आधारित नहीं है, बल्कि वह मानव में सम्पूर्ण परिवर्तन पर आधारित है। जब तक जीवन का अज्ञान से ज्ञान की अवस्था में सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं हो जाता तब तक ज्ञान की पूर्णता नहीं होती।
किसी विषय को पढ़ लेना या श्रवण कर लेना और फिर उसे तोते की तरह दूसरे को सुना देना या बिना देखे लिख देना यह ज्ञान नहीं है। इस प्रक्रिया में ज्ञान नहीं होता अपितु विषय का विवरण प्राप्त होता है। उस विवरण के आधार पर जब तर्क द्वारा मनन किया जाता है कि क्या यह विवरण यथार्थतः सत्य है तब ज्ञान की अग्रिम प्रक्रिया की दिशा में व्यक्ति बढ़ता है, लेकिन मनन द्वारा संतुष्ट हो जाने पर ही ज्ञान की सिद्धि नहीं हो जाती, उससे आगे की प्रक्रिया में उसे निरन्तर अपने अभ्यास में लाने का प्रयत्न किया जाता है, इसे निदिध्यासन कहते हैं।
जब वह पूर्णतः अभ्यास सिद्ध हो जाता है तब ज्ञान की पूर्णता होती है वरना सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई बातें केवल ज्ञान की प्रेरक होती हैं, जो मात्र नकल हैं। नकल को ज्ञान की कोटि तक ले जाने की प्रक्रिया ही ज्ञान की साधना है।
सुन लो और मान लो यह सेमेटिक ज्ञान प्रक्रिया है। वहाँ केवल सुनकर मान लेना ही ज्ञान है, लेकिन भारतीय ज्ञान परम्परा में रह नहीं चलता, यहाँ सुनो, सुनने के बाद उस पर विचार करो, फिर उसका अभ्यास करो, तब स्वीकार करो।
*आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।*
अर्थात् आत्मा अमूर्त होते हुए भी इसे देखा जा सकता है, सुना जा सकता है, मन से यह अनुभव गम्य है तथा इसे अनुभव में लाने के लिए अभ्यास भी किया जा सकता है ।
*आज का दिन शुभ मंगलमय हो।*
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