विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कवि:
प्रासावीद् भद्रं द्विपदे चतुष्पदे।
वि नाकमख्यत् सविता वरेण्यो
ऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति।।
(ऋग्वेद)
यस्य प्रयाणमन्वन्य इद् ययुर्देवा
देवस्य महिमाधमोजसा।
य: पार्थिवानि विममे स एतशो
रजांसि देव: सविता महित्वना।।
(ऋग्वेद)
सबके द्वारा वरणीय, आकाश को प्रकाशित करने वाले,दे वी उषा के प्रयाण के अनंतर प्रकाशित होने वाले मेधावी सविता अपने सभी रूपों को प्रदर्शित करते हैं। वे मनुष्यों और पशुओं के कल्याणकर्ता हैं।
जिस सविता के महिमा युक्त मार्गों का अनुगमन करते हुए अग्नि आदि सभी देवता अपने बल को धारण करते हैं। जिस सविता ने अपनी महत्ता से पृथ्वी आदि लोकों को व्याप्त किया, वे अपने तेज से ही अत्यंत महिमावान् हैं।'
जय श्री सूर्य देव प्रणाम

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