महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था ..!
पांडव हिमालय को जा चुके थे ...!
और आर्यावर्त पे अभिमन्यु के पुत्र ..चक्रवर्ती सम्राट महाराज परीक्षित का शासन था ..!
वैसे तो चारो ओर शांति थी ..पर नागराज तक्षक ( यहां नागों का मतलब सांप से नही है ..बल्कि नाग मनुष्यों की ही एक जाति थी ...जो सनातन परंपरा में विश्वास नही रखते थे ..) के अनुयायी जब तब उपद्रव करते रहते थे .!
हालांकि अर्जुन ने नाग कन्या उलूपी से विवाह किया था ...जिससे अर्जुन को एक पुत्र बभ्रुवाहन भी था ...
जो कि महाभारत के युद्ध में वीरता से लड़ा था ..!
फिर भी नाग अर्जुन के हाथों अपनी पराजय को भूले नही थे ..!
इसलिए परीक्षित से द्वेष रखते थे ..! और मौका मिलते ही कहीं न कहीं वार कर बैठते थे ..!
जिससे निपटने के लिए महाराज परीक्षित अक्सर कड़ी निंदा से काम चलाते थे ..!
जब ज्यादा ही हो जाता तो कहीं कहीं छिटपुट सैन्य करवाई भी होती रहती ..!
कालांतर में श्रृंगी ऋषि से कुछ विवाद में तक्षक षडयन्त्र पूर्वक महाराज परीक्षित की हत्या कर देता है !
उनके बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय सम्राट बनते हैं ..!
मंत्री मंडल की पहली ही मीटिंग में महाराज जनमेजय नाग यज्ञ का प्रस्ताव रखते हैं ..!
चारो ओर हाहाकार मच जाता है ..!.तक्षक से ले के इंद्रलोक तक सन्नाटा पसर जाता है ..!
चारो ओर दूत दौड़ने लगते हैं ...बड़े बड़े ऋषि मुनि कुरुकुल की मर्यादा का हवाला दे के जनमेजय से नाग यज्ञ स्थगित करने की प्रार्थना करते हैं ..!
सेकुलरों की पूरी फौज महाराज जनमेजय को सांप्रदायिक घोषित करती है ..!
पर महाराज नाग यज्ञ की तैयारी का आदेश जारी कर देते हैं ..!
नाग यज्ञ का कॉन्सेप्ट बहुत वीभत्स था ..!
मतलब नागों का समूल नाश .!
न कोई दोषी न कोई निर्दोष सबकी एक सजा ..!
गांव गांव जा के सैनिक एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदते थे !
उसमे लकड़ी डाल के भयानक आग जलाई जाती और नागों के बीबी बच्चे वृद्ध जो भी मिलते उन्हें जिंदा उसी आग में झोंक दिया जाता ..!
नागों का सफाया होने लगा ..! जब चंद नाग ही बचे फिर महर्षि वेद ब्यास ने जनमेजय से कहा ..!
राजन अब शांत होओ ..! नागों से तुम्हारी रिश्ते दारी भी है अतः अब ये संहार बंद करो..! और समाप्त हुआ कई पीढ़ियों से चली आ रही नागों की कुरुओं के प्रति कटुता ..!
अपराधियों का इलाज सिर्फ नाग यज्ञ है ..! यानी समूल नाश ।

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